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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Friday, August 23, 2013

॥श्रीहरि:॥ हे नाथ! हे प्रभु! हे मेरे प्रभु! हे मेरे नाथ!


॥श्रीहरि:॥

नित्य प्रार्थना

कर प्रणाम तेरे चरणोंमें लगता हूँ अब तेरे काज ।

पालन करनेको आज्ञा तव मैं नियुक्त होता हूँ आज॥

अन्तरमें स्थित रहकर मेरे बागडोर पकड़े रहना ।

निपट निरंकुश चंचल मनको सावधान करते रहना॥

अन्तर्यामीको अन्त:स्थित देख सशंकित होवे मन।

पाप-वासना उठते ही हो नाश लाजसे वह जल-भुन॥

जीवोंका कलरव जो दिनभर सुननेमें मेरे आवे ।

तेरा ही गुणगान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे॥

तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि! तुझमें यह सारा संसार ।

इसी भावनासे अन्तरभर मिलूँ सभीसे तुझे निहार ॥

प्रतिपल निज इन्द्रियसमूहसे जो कुछ भी आचार करुँ।

केवल तुझे रिझाने को, बस तेरा ही व्यवहार करुँ ॥
पदरत्नाकर से


यह तो उत्त्म स्थान है ही। यह जगह बहुत वैराज्ञ्यमय है। आँख खोलते ही गंगाजी और पहाड़ के दर्शन होते हैं। ऎसी भाग्य से ही होती है। मनुष्य माया के परतन्त्र है, जकड़ा हुआ है, फिर भी यहाँ आना हुआ। इसमें परमात्मा की बड़ी भारी दया है।

सब ग्रन्थों का सार वेद हैं, वेदों का सार उपनिशद्‌ हैं, उपनिषदों का सार भगवान्‌ की शरणागति है। जो अनन्यभाव से भगवान्‌ की शरण हो जाता है, उसे भगवान्‌ सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं।

ये परिवार जानता है और दृढ़ता से विश्वास करता है कि केवल भगवान्‌ ही हमारे अपने है।

हमारे परिवार 'गीता प्रपन्न परिवार' का अर्थ है -

'गीता' - भगवान्‌ का गीत. सारे शास्त्रों का सार वेद है, वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है।

'प्रपन्न' - समर्पण। गीता का सार शरणागति।

'परिवार' - जिन्होंने भी गीता का जाने या अनजाने में शरण लिया है वे इस परिवार के सदस्य है।

गीता के प्रचार की बात कल कही ही थी। भगवान्‌ ने भी गीता में कहा है कि -
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥


न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥

(गीता १८:६८-६९)

जब मैंने गीता पढ़ी और ये श्लोक पढ़े तो उनका मेरे ऊपर बड़ा असर पड़ा कि भगवान्‌ को इसका प्रचार बहुत प्रिय है और इसके प्रचार करने की बात मेरे दिल में आयी। अतः आप लोगों को भी भगवान्‌ की भक्ति करते हुए यथाशक्ति गीता के प्रचार की चेष्टा करनी चाहिये।

गीता:

गीताजी का एक श्लोक पढ़कर भी अपना जीवन बना ले तो बेड़ा पार है। गीताजी में बताया 'न जायते म्रियते आत्मा का नाश नहीं होता, इस बात का हमें ज्ञान हो जाय, फिर चाहे तोप के बाँध दो, न बम का भय न तोप का भय। एक श्लोक को भी समझ ले तो निर्भय हो सकते है। निर्भयता नहीं आई तो समझे नहीं। समझे कैसे? पाठ करते रहो। कोई न कोई समझानेवाला मिल ही जायेगा।

गीता का उपदेश ऐसा उपदेश है कि सूखे लकड़े को सुनाया जाय तो वो भी हरा भरा हो जाय। युद्ध में सेनापति होता है, वो जिस प्रकार संकेत करता रहता है, उसके संकेत के अनुसार सब चेष्टा करते रहते हैं, मृत्यु की भी परवाह नहीं करते। इसी प्रकार गीता भगवान्‌ के वचन हैं, उनके संकेत के माफिक हम चलें तो हमारी विजय में कोई शंका नहीं है। निश्चय हमारी विजय है। उस विजय में तो शंका भी है, पर यह भगवद्‌ क आदेश है, यह धर्म युद्ध है - इस विजय में शंका नहीं है।

युद्ध में भीम और अर्जुन की घोषना सुनकर - जो कायर थे, वो भी झूझने लग जाते थे, वीरता का वीर चढ़ जाता, उससे नाचने लग जाते मरने के लिये। जैसे युद्ध में उत्तेजना पैदा करने के लिये अर्जुन और भीम की घोषना है, इसी प्रकार काम-क्रोध भटों को मटियामेट करने के वास्ते भगवान्‌ की यह गीता रूपी घोषणा है। वो बहुत कम मूल्य में हमें मिल रही है। इसपर भी हम भगवत्‌ प्राप्ति से वंचित रह गये तो हमारा जीवन व्यर्थ है।


उद्देश्य:

जितने महात्मा हुए उन्होंने हजारों लाखो का कल्याण किया पर उनसे भी बढ़कर मनुष्य हो सकता है। जबतक हमनें यावन्मात्र जीवों का कल्याण नहीं किया, तबतक क्या किया? यह अपना उद्देश्य बनाना चाहिये।
शंकरजी का ऐसा नियम है कि काशी में जो मरता हैं उसकी मुक्ति होती है। पर हम तो ऐसा करे कि कहीं भी कोई मरे, सबकी मुक्ति होवे। असम्भव क्या है? असम्भव कुछ भी नहीं है। जानवर भी असम्भव को सम्भव कर लेता है। फिर हमारे लिये क्या कठिन है। एक पक्षी था - समुद्र किनारे अण्डे दिये, समुद्र बहा के ले गया। अब चोचों से जल बाहर निकालने लगे। उन्होंने भी अपने दृढ़ निश्चय के कारण समुद्र से अण्डे बाहर निकलवा लिये। हमारी बात तो ऐसी असम्भव भी नहीं है। यह तो सम्भव है। हमें तो ध्येय रखना चाहिये कि सब के साथ ही हमारा कल्याण हो।




ध्येय रखकर .... हीरा और काँच में क्या भेद है? ऐरण के अंदर घुस जायगा तो हीरा है और टूट जायगा तो काँच है। सोना जलने का नहीं, हीरा फूटने का नहीं। इसी प्रकार जो चीज नाश होती है उसे छॊड़ दो। अपना समय किस काम में बिताना चाहिये जो नित्य वस्तु है। सोने की पहचान है - आग में तपाओ कमती नहीं होता तो ठीक है। इसके लिये क्या कसौटी है? 'नासतो विद्यते भावो'।


गीता क अच्छी तरह ज्ञान हो जाना चाहिये। इतना नहीं तो शब्दार्थ तो हो जाय। इतना नहीं तो बारह अध्याय, यह भी नहीं तो छ: अध्याय। यह भी न हो तो तीन ही अध्याय। नहीं तो कम से कम एक अध्याय क पाठ तो रोज होना ही चाहिये। इतना भी न हो सके तो तीन श्लोक तो बालकों को याद कराना चाहिये। उस पर फिर पाश्चात्य शिक्षा क विष नहीं चढ़ सकता।

गीता साक्षात अमृत है। अमृत पिला दो फिर विष का असर हो ही नहीं सकता। फिर मृत्यु नहीं होती। जन्म मरण से छूट जाता है।

संसार में सारी गीता का नहीं तो तीन श्लोक का तो प्रचार करना ही सारे भाईयों को प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये। सारे धर्म आचरण इनमे में कूट कूट कर भर दिया है।

न जायते म्रियते वा कदाचिन

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ गीता २/२०॥

इस एक श्लोक का जिसे ज्ञान हो जाता है वह फिर मुक्त हो जाता है। फिर वह न तोप से डरता है न आग से डरता है।

मैं सर्वकाल में अपनी अखण्डता में स्तिथ हूँ । मैं करता-कराता कुछ नहीं हूँ ।

मेरा कुछ नहीं हैं ।

मुझे कुछ नहीं चाहिये ।

मैं कुछ नहीं हूँ, केवल परमात्मा ही हैं ।

सर्वसमर्थ प्रभु मेरे अपने हैं ।

एक सत्ता के सिवाय और कुछ है ही नहीं । उस सत्ता में मैं-तू-यह-वह लग ही नहीं सकते

जिन्हें अहम्‌ को अभिमान शून्य रखना अभीष्ट होता है, वे आत्म ख्याति से बच कर रहते है ।

जो जीवन का सत्य है, उसे व्यक्ति के माध्यम से प्रकट करना उसका मूल्य घटाना है ।

जिन्होंने परम प्रमास्पद की सत्ता से भिन्न अपना अस्तित्व ही नहीं रखा, वे अपने नाम से कोई बात कैसे कह सकते हैं ? उन्होंने अपनी विशेषता मानने की भूल कभी नहीं की ।

शरीर विश्व के काम आ जाय, अहम्‌ अभिमान शून्य हो जाय और हृदय परम प्रेम से परिपूर्ण हो जाय ।  जो मौजूद में आस्था रखता हो, मिले हुए का सदुपयोग करता हो, दुरुपयोग न करता हो और देखे हुए की कामना न रखता हो, वह स्वाधीन हो जाता है ।

पूर्ण आस्तिकता यह है कि जगत्‍ और परमात्मा का विभाजन कभी हुआ ही नहीं । जिसका विभाजन हो जाय, उसका अस्तित्व ही नहीं है ।

'गीता' - भगवान्‌ का गीत. सारे शास्त्रों का सार वेद है, वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है।

'प्रपन्न' - समर्पण। गीता का सार शरणागति।

'परिवार' - जिन्होंने भी गीता का जाने या अनजाने में शरण लिया है वे इस परिवार के सदस्य है।



इस कार्य में हमारे प्रेरक और मार्गदर्शक केवल भगवान्‌ और उन्के सच्चे भक्त है। जिनके नियम और सिद्धान्त हमें इस कार्य में प्रेरित और मार्गदर्शन कर रहे है वे है -


श्री जयदयालजी गोयन्दका (सेठजी)

श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार (भाईजी)

और

स्वामी रामसुखदासजी (स्वामीजी)

इन महापुरुषों का कोई परिचय की आवश्यक्ता नही है और हमारे द्वारा इसका प्रयास करना हमारी मूर्खता ही होगी। इन्के जीवन के नियमों और उद्देश्य का पालन ही हमरा ध्येय है। इनका जीवन केवल मनुष्यमात्र के हित और कल्याण के लिये ही बीता।

इस परिवार का सदस्य होने के लिये आपको पहले ये स्वीकार करना पड़ेगा कि आप केवल भगवान्‌ के एक सेवक है (चाहे आप उन्हें जिस किसी नाम से पुकारे)और नही तो कम से कम आप उनके हाथों के एक यन्त्र बनना चाहते है। श्रद्धेय सेठजी, भाईजी और स्वामीजी की वाणी और अनुभव के आधार पर आप अगर इसको (इस उद्देश्यको) एक बार भी सरल हृदय से स्वीकार कर लेते है तो भगवान्‌ खुले हाथों से आपका अपने परिवार में स्वागत करते है।

वे आपका स्वागत करने के मौके के लिये इन्तजार कर रहे है - और वो मौका अभी आपके सामने है।

उनके परिवार के संसार में प्रवेश करने के लिये आपको केवल नीचे ये लिखना है कि 'मैं केवल आपका होना चाहता हूँ'। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप निराश नहीं होंगे और भगवान्‌ की कृपा से आपका जीवन अच्छे के लिये अवश्य बदलेगा।

'हे नाथ' ! पुकार की महिमा

'मेरे नाथ' - इसका प्रादुर्भाव हुआ था उदयपुर में । एक दु:खी प्राणी या दु:खी साधक को देखकर यह उदित हुआ । 'मेरे नाथ' - आप मेरे हैं, इसलिये प्यारे है । 'नाथ' पद का प्रयोग मालूम है किसके लिये किया जाता है ? जो रक्षक हो और समर्थ हो ।

'मेरे नाथ' वाक्य से जो बोधार्थ नि:सृत होगा, उसके तीन रूप होंगे - प्रियता, निश्चिन्तता और निर्भयता । यदि किसी भाई या बहिन के जीवन में निश्चिन्तता और निर्भयता है तो आप ही बताइये, इससे ऊँचा जीवन और क्या हो सकता है ? परन्तु ध्यान रहे, यह निश्चिन्तता और निर्भयता नासमझी से भी होती है, और बेशर्माई से भी होती है । बेशर्माई से जो होती है, उसमें प्रियता नहीं होती, उसमें सुखासक्ति होती है । इसलिये निश्चिन्तता और निर्भयता से पहले प्रियता अपेक्षित है ।



मैं तो लोगो से कहता हूँ कि यदि तुम्हारे दिल में घबराहट हो और उस घड़ी कहीं तुम्हारे लबपर आ जाय - 'मेरे नाथ !' तो आप सच मानिये, आपकी घबराहट नाश हो जायगी । उस क्षण यदि आपको याद आ जाय कि आप अनाथ नहीं, सनाथ हैं तो भय कैसे निवास करेगा ? भय तो अनाथ के जीवन में निवास करता है । जो सनाथ है, उसके जीवन में भय कहाँ से आयेगा ? उसके जीवन में नीरसता कहाँ से आयेगी ? वह असमर्थता से पीड़ित क्यों होगा ? असमर्थता से पीड़ित वही होगा, जो अनाथ है । नन्हा-सा बालक अपनी माँ की गोद में क्या असमर्थता का अनुभव करता है ?


जीवन दर्शन

'मेरे नाथ' से सुन्दर शब्द अपनी भाषा में नहीं हैं ।

स्वामी शरणानन्दजी

राम राम

हे नाथ! हे मेरे नाथ! - सब मन्त्रों का महामन्त्र - थोड़ी थोड़ी देर में कहते रहे - हे नाथ! हे मेरे नाथ!!

राम राम

॥श्रीहरि:॥

गीता का अर्थ जान लेने पर समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धी होती है - आदि शंकराचार्य

गीता उपनिषदों से चुने हुए आध्यात्मिक सत्योंके सुन्दर पुष्पोंका गुच्छा है - स्वामी विवेकानन्द

गीतसे मैं शोक में भी मुस्कुराने लगता हूँ - महात्मा गाँधी

मेरी अंतिम प्रार्थना यही है कि हर व्यक्ति बिना किसी अपवादके अपने जीवन के प्रारम्भिक क्षणों में ही गीता में दी हुई गृहस्थ धर्मकी शिक्षा भलीभाति सीख ले - बालगंगाधर तिलक

हर एक दर्शन के अलग-अलग अधिकारी होते है, पर गीता की यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहने वाले सबके सब इसके अधिकारी है - स्वामी रामसुखदासजी

गीता सार

१. सांसारिक मोह के कारण ही, मनुष्य 'मैं क्या करूँ और क्या नहीं करूँ' - इस दुविधा में फँसकर कर्तव्यच्युत हो जाता है। अतः मोह या सुखासक्ति के वशीभूत नहीं होना चाहिये।

२. शरीर नाशवान है और उसे जाननेवाला शरीरी अविनाशी है - इस विवेक को महत्त्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना - इन दोनों में से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिन्ता-शोक मिट जाते हैं।

३. निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरों के हित के लिये अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करनेमात्र से कल्याण हो जाता है।

४. कर्मबन्धन से छूटने के दो उपाय हैं - कर्मों के तत्त्व को जानकर निःस्वार्थभाव से कर्म करना और तत्त्वज्ञान का अनुभव करना।



५. मनुष्य को अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के आनेपर सुखी-दुःखी नहीं होना चाहिये; क्योंकि इनसे सुखी-दुःखी होनेवाला मनुष्य संसार से ऊँचा उठकर परम आनन्दका अनुभव नहीं कर सकता।


६. किसी भी साधन से अन्तःकरण में समता आनी चाहिये। समता आये बिना मनुष्य सर्वथा निर्विकार नहीं हो सकता।

७. सब कुछ भगवान्‌ ही हैं - ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है।

८. अन्तकालीन चिन्तन के अनुसार ही जीव की गति होती है। अतः मनुष्य को हरदम भगवान्‌ का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहोये, जिससे अन्तकाल में भगवान्‌ की स्मृति बनी रहे।

९. सभी मनुष्य भगवत्प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वे किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, देश, वेश आदि के क्यों न हो।

१०. संसार में जहाँ भी विलक्षणता, विशेषता, सुन्दरता, महत्ता, विद्वत्ता आदि दीखे, उसको भगवान्‌ का ही मानकर भगवान्‌ का ही चिन्तन करना चाहिये।

११. इस जगत‌ को भगवान्‌ का ही स्वरूप मानकर प्रत्येक मनुष्य भगवान्‌ के विराट्‌रूप के दर्शन कर सकता है।

१२. जो भक्त शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने आप को भगवान्‌ के अर्पण कर देता है, वह भगवान्‌ को प्रिय होता है।

१३. संसार में एक परमात्मतत्त्व ही जाननेयोग्य है। उसको जाननेपर अमरता की प्राप्ति हो जाती है।

१४. संसार-बन्धन से छूटने के लिये सत्त्व, रज और तम - इन तीनों गुणों से अतीत होना जरूरी है। अनन्य-भक्ति से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत हो सकता है।

१५. इस संसार का मूल आधार और अत्यन्त श्रेष्ठ परमपुरुष एक परमात्मा ही हैं - ऐसा मानकर अनन्यभाव से उनका भजन करना चाहिये।

१६. दुर्गुण-दुराचारों से ही मनुष्य चौरासी लाख योनियों एवं नरकों में जाता है और दुःख पाता है। अतः जन्म-मरण के चक्कर से छूटने के लिये दुर्गुण-दुराचारों का त्याग करना आवश्यक है।

१७. मनुष्य श्रद्धापूर्वक जो भी शुभ कार्य करे उसको भगवान्‌ का स्मरण करके, उनके नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ करना चाहिये।

१८. सब ग्रन्थों का सार वेद हैं, वेदों का सार उपनिशद्‌ हैं, उपनिषदों का सार भगवान्‌ की शरणागति है। जो अनन्यभाव से भगवान्‌ की शरण हो जाता है, उसे भगवान्‌ सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं।

- ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज के गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित गीता-साधक-संजीवनी ग्रन्थ के आधार पर।

॥श्रीहरि:॥

गीता भगवान्‌का स्वरूप ही है। गीता को साक्षात्‌ भगवान्‌ मान लेवे और गीता के स्पर्श, दर्शन से भगवान्‌का स्पर्श, दर्शन माने तो फिर शीघ्र ही कल्याण हो जाता है। गीता भगवान्‌का श्वास है और भगवान्‌के प्राण है। गीता भगवान्‌ की वाङ्‌मयी मूर्ति है। गीता के पाठ में भगवान्‌की वाणी सुनने का सा प्रेम होना चाहिये। भाव की कमी के कारण लाभ से वंचित हो जाते है। भाव से मन लगाकर पाठ करने से हजारों गुणा अधिक लाभ हो सकता है।

धुन १:

हे नाथ! हे प्रभु! हे मेरे प्रभु! हे मेरे नाथ!

ये पुकारो सच्चे हृदय से। सब बन्धन टूट जायेगा - सब ठीक हो जायेगा। और मैं भगवान्‌ का हूँ और भगवान्‌ मेरे है। सिवाय भगवान्‌ का मेरा कोई नहीं है। मेरा कोई नहीं है, मैं और किसी का नहीं हूँ, केवल भगवान्‌ का हूँ और भगवान्‌ ही केवल मेरे है।

ये खास बात है। ये हमारे खोज की खास बात है। मैं भगवान्‌ का हूँ भगवान्‌ मेरे है।

और कोई मेरा नहीं है और मैं किसी क ही नहीं हूँ।

मैं केवल भगवान्‌ का हूँ केवल भगवान्‌ मेरे है।

धुन २:

राम राम राम

धुन ३:

कम से कम इतनी बात तो मान लो - भगवान‌ से पुकारते रहो एकान्त में - हे नाथ! हे मेरे नाथ! मैं भूलूँ नहीं! यूं कहते रहो।

हे नाथ! भूलूँ नहीं! हे नाथ! हे मेरे प्रभु। हे मेरे नाथ! कहो।

आप गए गुजरे है, आचरण आपके अच्छे नहीं है, सब ठीक हो जायेंगे। कुसंग हो जाये - हे नाथ। पाप बन जाये - हे नाथ। हे प्रभु। कृपा करो नाथ। बचाओ नाथ बचाओ।

बचाएँगे - भगवान्‌ बचाएँगे।

ये मामूली बात है - परन्तु भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध रहेगा वक्त पर चेत हो जायेगा - रस्ते पर आ ही जाओगे। फायदा होगा, होगा, होगा।

हम भगवान्‌ के है - हम भगवान्‌ के है - भगवान्‌ हमारे है। हे नाथ मैं भूलूँ नहीं! हे प्रभु मैं भूलूँ नहीं।

ये दामी बात है - बहुत श्रेष्ठ बात है - ऐसी कृपा करो नाथ मैं भूलूँ नहीं।

हे नाथ। हे कृपानाथ। हे मेरे प्रभु - हे मेरे प्रभु। मैं भूलूँ नहीं। अपना उद्योग उतना काम नहीं आता जितना भगवान्‌ का सहारा काम करता है।

और सहारा भी क्या - हृदय से कहते रहो हे नाथ भूलूँ नहीं। केवल इतनी सी बात है।

बहुत लाभ की बात है।

धुन ४:

राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम।

सुनने में आनन्द आवे। ऐसा प्रेम से।

सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम। सीता राम।

एक एक नाम में रस आता रहे।

सीता राम। सीता राम। सीता राम।

धुन ५:

हे नाथ। हे नाथ। जहा कोई आफत आवे और अपने बल से काम न चले वहा प्रबल को पुकारो। हे नाथ। हे नाथ। हे नाथ। पुकारो।

देखो भाई - सब प्रश्नों का असली उत्तर है - हे नाथ - हे प्रभु - हे प्रभु - हे मेरे नाथ - हे मेरे प्रभु। पुकारो।

सब जितनी आफत है सब सब मिट जायेगी। एक दवाई राम बाण दवाई है ये। हे प्रभु। हे मेरे प्रभु। हे मेरे नाथ। हे मेरे प्रभु। हे भगवन्‌। हे मेरे नाथ।

पुकार के तो देखो। कर के देखो। होता है की नहीं होता है। नहीं होता हो तो फिर कान पकड़ो मेरा कि तुमने बताया नहीं हुआ महाराज। हे नाथ हे नाथ पुकारो। भगवान्‌ को पुकारो।

धुन ६:

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

धुन ७:

हे नाथ भूलूँ नहीं। हे नाथ हे नाथ मैं भूलूँ नहीं।

राम राम राम राम राम राम ...... हरदम करो हरदम। हे नाथ हे नाथ मैं भूलूँ नहीं।

दो चार मिनट हो जाये फिर कह दो हे नाथ भूलूँ नहीं - दस मिनट हो गया अरे गजब हो गया। हे नाथ दस मिनट चला गया - राम राम राम राम - भूलूँ नहीं - राम राम राम राम राम राम राम...

अब भगवान्‌ को याद करो - हे नाथ - हे नाथ - मैं भूलूँ नहीं - हे नाथ मैं भूलूँ नहीं - हे नाथ मैं भूलूँ नहीं। सच्चे हृदय से - हे नाथ हे नाथ मैं भूलूँ नहीं।

ये ही कहना है आप से। कृपा करोगे ना? करोगे? कृपा करो। सच्चे हृदय से।

धुन ८:

हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌

हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌ हरि शरणम्‌

धुन ९:

हे नाथ। हे नाथ मैं भूलूँ नहीं। हे नाथ। हे प्रभु। हे मेरे प्रभु। हे मेरे नाथ। आपको भूलूँ नहीं हरदम कहते रहो हे नाथ भूलूँ नहीं। हे नाथ। आपको भूलूँ नहीं। परन्तु छोड़ना नहीं।

गंगास्नान, साधूदर्शन खूब आनन्द ही आनन्द हो रहा है। ऐसी जगह भी भाग्य से ही मिले है। सेवा भजन ध्यान - तीर्थ ये सब धन है। इस धन को लेजाकर धन से धन बढ़ावे। खूब साधन करनो।

मनुष्य के जन्म में इसो समय भाग्य से ही मिल है। पद पद में दया भरी पड़ी है। मानव शरीर भारत भूमि में जन्म, ये जाति, ऎसी जगह मिलनी, फिर भजन में प्रवृति, ऎसो मोको भोत कम मिल है। प्रभु कहते है हज़ारों में कोई एक यत्न करता है। यत्न करने वालों की गिनती में तो आप लोग भी आगये हैं, प्रभु के दर्शन भी कभी ना कभी हो जायेंगे। (पैड १०७ पृष्ठ ६५)

संसार के विषय भोग विष हैं। विष खाने से तो एक बार मरता है। विषय भोगने से लाखों बार जीना मरना पड़ता है। जो भगवान के भजन रूपी अमृत को छोड़कर विषयों में रमता है वह गले में फांसी लेकर मरता है।

अत: अमृत तत्व की प्राप्ति के लिये रात दिन तत्पर होकर भजन साधन करना चाहिये। फिर सारा संसार मट्टी के समान लगेगा। रसहीन हो जायेगा। इसलिये सब तरफ से मन को हटाकर रात दिन ध्यान मे मुग्ध होकर समय बिताना चाहिये। सारी दुनिया में प्रभु का स्वरूप फैला हुआ है उसी में तन्मय हो जाना चाहिये।

न्याय को दो पैसे अच्छे, अन्याय के लाखों पैसे अच्छे नहीं। अत: न्याय से ही द्र्व्य कमाना चाहिये। पहले अपनी दुकान काशी बनानी चाहिये। घर तो पीछे काशी बनेगा। काशी का मतलब यही है की वहाँ मरने से मुक्ति हो जाती है।

पति ने जिमावे वैसे ही सब घरवालों को एक जैसी रसोई जिमावे। हाँ, बाहर वाला ने एक नम्बर खुवाकर आप बची खुची खावे तो और भी उत्तम बात है। उसका घर समझो काशी है। बचे हुए अन्न के पानी में नेवला लोटपोट हुआ, आधा शरीर सोना का हो गया। जो वहां जीमता है वह पवित्र हो जाता है। वह घर काशी के समान है।

जैसे बनिया ग्राहक को देखकर प्रसन्न होता है वैसे अतिथियों को देखकर प्रसन्न होवे। ईश्वर समझकर उनकी सेवा पूजा करें और समझें की असली लाभ आज हुआ है। (पैड १०७ पृष्ठ ७७)

काम में आगाड़ी, भोगों में पिछाड़ी। खाने पहनने की चीजें शेष में जो बच जाये उसे आप लेले। वह प्रसाद है। बचाया हुआ अन्न विषाद है।

जगज्जननी - कंचन, कामिनी, धन रूप में, आकार में आ गई - ये सब साक्षात भगवती का रूप है। शरीर निर्वाह मात्र जो इनसे काम लेता है वह पार हो जाता है और जो अधिक भोग करता है वह डूब जाता है। सारे विषयों का जो उपभोग करते है उनकी दशा कही नहीं जा सकती। सारे वृक्ष, खड़े हैं, ये भोगी थे - नहीं तो इनकी यह दशा नहीं होती। इसलिये कहते हैं चेत करो - पर आप कहते हैं देखा जायेगा। अभी तो खाओ पीवो मौज करो।

तीनों लोक ही हमारा स्वदेश है। देश ही हमारा स्वदेश है यह तो बहुत छोटी बात है। प्रथम तो हमको अपने नज़दीक वालों की सेवा करके आगे बढ़ना चाहिये। विशेष बात यही है कि जिस देश में आपत्ति हो उसकी ही सेवा करनी चाहिये। पृथ्वी से बढ़कर चन्द्र लोक में आपत्ति होतो उनकी सेवा करना। असली तो यही है सारे ब्रह्माण्ड की सेवा करना।

एक परमात्मा के सिवाय सब कुछ उड़ा दो। याही कोशिश करो कि म्हारो सारो समय परमात्मा में ही लागे। या शर्त करो। प्राप्ति की जरूरत ही मत राखो। फिर आप ही प्राप्ति हो गयी।



अपने तो भगवान का निरन्तर चिन्तन स्मरण चालू रखना चाहिये और सात पाँच की जरूरत नहीं। अपने तो भगवान का निरन्तर स्मरण जल्दी चालू करलो। शरीर का कुछ पता नहीं कब शान्त हो जाय।


सकाम निष्काम नामजप सत्संग कोई बात की शर्त नहीं। केवल शर्त याही कि एक परमात्मा को लक्ष्य नहीं छूटे।

जिसके मरने पर सारे लोग खुश होते हैं वह नरक में गया। जिसके जाने से रोते है वह मानो स्वर्ग में गया। उसको सोचना चाहिये - शरीर की तो राख होने वाली है, इससे काम लेना चाहिये।
ईश्वर ने शरीर दिया है तो दूसरों का उपकार करना चाहिये। ईश्वर आपकी परीक्षा ले रहा है। आप उत्तीर्ण हो जाऒगे तो बड़ा राज्य दे दिया जायेगा। हम छोटे गृह्स्थ को न्यायपूर्वक नहीं चला सकते। आशा ईश्वर प्राप्ति की रखते हैं।


यही निश्चय करना चाहिये कि हमलोग रात दिन भगवान का भजन ध्यान कीर्तन करते रहें। गीता भवन में जिनका परम भाग्य है उनका यहाँ रहना होता है। हे प्रभु हे दीनबन्धु, हम लोगों को ऎसा समय कब मिलेगा कि रात दिन आपका गुण गाते हुए, भजन ध्यान करते हुए इस जगह वास करे।

सब कामा ने भगवान का काम समझना, भगवान का भजन ध्यान ने आपना काम समझना।

सहने की शक्ति खूब बढ़ावे। पाँच पाँच आदमी आपनी भूल बताव जकीन खूब राजी से स्वीकार कर लेवे। जठे ताईं भूल मंजूर करने की गुन्जाइश हो वहाँ तक स्वीकार कर लेवे। यदि कुछ सहने लायक नहीं हो तो चुप रह जावे।


मनुष्य को अपनी जवानी का विशेष ख्याल राखनी चाये। उसको बहुत नुकसान होवे। प्रभु हैं। तो उससे विष समान वचन क्यों बोलना चाहिये। ऎसे वचन बोलना चाहिये जो उद्वेग कारक नहीं। सत्य, हितप्रिय वाक्य बोलना चाहिये।

हमलोगों को गीता को रोम रोम में समाना चाहिये। हमलोगों को ऎसा अभ्यास करना चाहिये, सनीपात में बहके तो गीता बहके। हनुमानजी के माफ़िक, शरीर चीरने में राम राम। हमलोगों के रोम रोम से गीता ही निकले।

अपने द्वारा जो आज्ञा को पालन होय रयो है, वह भगवान की दया से हो रयो है। इससे भोत प्रसन्न होवे। महात्मा की तेरे पर बड़ी दया है - तेरे से यो काम लेवे है।

राग द्वेष से ही पुण्य पाप होवे। सगला राग द्वेष से दुख है। कोई ठोको पीटो, इसका उसके कुछ दुख नहीं होवे। ऎसे ही जिसके राग द्वेष नहीं है उसके दुख सुख नहीं होवेगो।

सर्वधर्मान को योभी अर्थ ले लेवे कि मेरो कोही एक चिन्तन कर। चाहे और धर्मों का पालन हो ही नहीं तो कोई आपत्ति नहीं। उसके तो केवल इतना ही लागू पड़े है कि एक परमात्मा ने याद रखनो।

सारो ब्रह्माण्ड दीखे है, उस सबने भगवान समझ लो। भेदभाव उठालो। दीखे सो भगवान, बोले सो भगवान, सुने सो भगवान। कोई भी एक भी मान लेवे तो भी काम हो जावे।

इस जगत में मनुष्य जन्म लेकर स्वार्थ रखकर काम करना लोहा खरीदना है। स्वार्थ न रखकर प्रभु के अर्पण कर देना पारस को लोहे को छुवाकर सोना बनाना है।
संसार में द्वेष आसक्ति से रहित भक्त मुझे पाता है। पर एक आदमी से द्वेष रखता है। वह मुझे नहीं प्राप्त होता। एक मनुष्य सारे शरीर को चंदन से लीपता है, फूल चढ़ाता है, पर एक अँगूली काटता है तो उससे क्या संतोष होगा? किसी से भी द्वेष करना प्रभु की अँगूली काटना है। ऐसे सोचकर किसी से द्वेष नहीं करना।
किसी से वैर हो तो जलदी समाप्त कर देना चाहिये। जिस-किस प्रकार हो, जाकर माफी माँग लेना चाहिये। जैसे भी हो वैर को समाप्त कर देना चाहिये। वैर ही जनम देने वाला है। वैर लेकर संसार में मरोगे तो दान, जप, तप - कुछ भी करो, निश्चय घोर संसार में जाओगे।

यहा से तो जाकर यथा शक्ति नियमों को पालने की चेष्ठा करनी चाहिये। एकान्त में जो ध्यान करते है उसे खूब ठीक बिताना चाहिये। एक घण्टा को अच्छी तरह से बिताने से सौ वर्ष का काम एक वर्ष दे सकता है।
गीता का खूब मन्थन करना चाहिये। उससे अमृत निकालना चाहिये। उसका पान करने से प्राप्ति हो जाती है। खूब प्रेम में मुग्ध होकर शान्ति पूर्वक ताल, राग सहित श्लोक पढ़कर, अर्थ समझकर, ध्यान करते हुए पाठ करना चाहिये।
प्रेम, भजन, सेवा - इनकी रक्षा करनी चाहिये। इनका बहुत ही उँचा दर्जा है। आपा तो छदाम भी कोनी समझा। गाजर माफिक बेचां हां। इससे बढ़कर चीज नहीं है। या समझो तभी आनन्द आवे। एक तरफ त्रिलोकी को राज्य, दूसरी तरफ एक भगवन्नाम।

घहना करा देवे तो खुषी हो जावे, तो घर में भगवन्नामोच्चारण कर लेवे तो कितनो आनन्द होनो चाहिये। नम को तो वर्षा बरसे तो आपा तो करोड़पति हो गया।

सेवा करता रहे, मुग्ध होता रहे। मानो रत्नों की वर्षा हो रही है। भजन सेवा है, सच्चो धन है। परम धाम में तो भजन, ध्यान, सेवा रूपी धन की ही टिकट मिलेगी।


रुपया ने तिजोरी में धरा वैसे ही भजन ने हृदय रूपी तिजोरी में धर लेवे। यह समझ लेवे कि सेवा धन है तो खोस खोस कर सेवा करां। उस धन ने असली समझ लेवे तो फिर या धन तो धूल के समान हो जावे। भगवान को दर्शन चावे तो थाने असली धन बता दिया है।

संयम, सेवा, साधना, सत्संग - इनमें चाहे जो एक बात जरूर पकड़ लेनी चाहिये। भगवान्‌ आवो चाहे मत आवो। बातां काम में आनी चाहिये, आपां इसी तरिया रात दिन तपस्या, भजन, ध्यान करता रवेंगा तो भगवान्‌ के मिलने की कोई जरूरत नहीं।



दिन थोड़े रह गये अथः धमड़की लगावो। सन्ध्या, गायत्री की दस और स्त्रियों के लिये हरे राम की चौदह माला, दो वक्त भोजन - एक लगावन एक खावन, कपड़े तीन। सेवा में अगाड़ी भोगों में पिछाड़ी।

घर में सबको प्रनाम करो। कोई गाली निकाले उसके साथ प्रेम का व्यवहार करो। यह बहुत उत्तम बात है। इसके होने पर प्रभु के मिलने में देर नहीं।
तर्पण, श्राद्ध करना उत्तम है। देखा देखी दूसरे की नहीं छोड़ देना चाहिये। अभ्यास नहीं है, पढ़े नहीं है या बान नहीं है - यह बाते बुरी है। यह करना उत्तम है।

पुरुष को स्त्री प्लेग के समान समझना चाहिये और स्त्री पुरुष को प्लेग के समान - ऐसे ही समझे। साँप काटने से विष चढ़ता है। स्त्री का विष चिन्तन या दर्शन, स्पर्श से ही चढ़ जाता है। जो अपना कल्याण चाहे वह उनसे दूर ही रहे।
व्यापार करते हुए राग द्वेष ना रहे यह शूरवीरता है। व्यवहार से मत डरो, राग द्वेष से डरो।
प्रभु की आज्ञा मानकर काम करने से राग द्वेष नष्ट हो जाते हैं। स्त्री पति के अनुकूल चलती है तो राग द्वेष नष्ट हो जाते हैं। पुत्र पिता के अनुकूल आज्ञा से चले तो राग द्वेष नष्ट हो जाते हैं।
निन्दा विष सी लगती है पर उसका अन्त अमृत है। ऐसे ही स्तुति अमृत सी लगती है उसका अन्त विष।
किसी को प्रभु के प्राप्त करने की इच्छा हो तो बड़ाई सर्वथा त्याग दे। यह इस विषय में सबसे बड़ा बाधा है। और भगवान के भजन ध्यान में निरन्तर सदा सम्बन्ध सब समय लगा रहे। इसीमें जीवन की सार्थकता है।

आश्रम गृहस्थ का ही रखें। आचरण से बने साधु कहावे गृहस्थी। बाहर की साधारण भीतर से बहुत ऊँची स्थिति रखें। बाहर से स्थिति जमाने से भगवान नाराज होते है। जनाना ही धारा है।

भगवान जो कुछ भी कर रहा है उसमें ये दुख मानो तो थे भगवान का प्रेमी कठे हुआ। जो भी कुछ होवे बिम आनन्द माननो चाहिये। जैसे ये वन है। इम दो चार आदमी एक गाछ आकर काट है। बिन थे पूछो कि क्यों काट रह्यो है? वो कह दे वे कि जयदयालजी कह्यो है म्हान। तब थे के बोलो? चुप रह जावो। अच्छा भाई, थान कहवे जैया कर लो।


किसी पर अत्याचार हो रह्यो है, बिन आपा रोक नहीं सका तो वो काम होन वालो थो। फिर अत्याचार करनेवाला ने क्यों रोक्या - कि वो नयो पाप कर रह्यो थो। आपन तो आपको काम कर लेवे। पिछे जो कुछ हो रह्या है जिको होने वाला था।


कोई विपरीत होवे उसमें उत्तेजना बहुत होवे। या बहुत खराब है। भक्ति, ज्ञान में खतरनाक चीज है। समय समय पर डंक भी मार है और विष भी चढ़ा लेवे। उसको सोच विवार करके एकदम हटाना चाहिये। ये परमात्मा की प्राप्ति में एकदम बाधक है।

घर में कोई अनुचित व्यवहार करे तो उसका प्रतिकार तो करे बिना उत्तेजना के और न्याययुक्त। उसके सुधार के लिये करे, अपने स्वार्थ के लिये नहीं।


किसी भाई को दो दिन में, चार दिन में, महीने में जाने का विचार है - तो इतने दिन में भगवान्‌ को प्राप्त करके ही जाना है। इतना तो मैं बहुत कह दियो यदि प्रेम हो तो भगवान्‌ एक दिन में मिल सकते है, ऐसा करे कि भगवान्‌ आपने आप ही आकर के मिले, अपने उसको नहीं बुलाना पड़े।

भगवान्‌ दीनबन्धु है। हम भी दीनों के बन्धु बन जावे तो हमको भगवान्‌ मिल जाते है। जितने धनी आदमी है वे दुखियों के दरवाजे पर जावे, देवे भले ही कुछ नहीं, परन्तु उसके पास जाना चाहिये। और अपने पास है तो फिर कन्जूस क्यों बने। जितने आपके पास है उतने तो आप हाथ रंग ले, फिर तो एक दिन जाना ही है।


भगवान हवा के रूप में आकरके रेणुका की वर्षा कर रहे हैं। महात्मा लोग जो सुनाते है, वे ज्ञान की वर्षा कर रहे हैं। भगवान राम समुद्र के समान है, महात्मा लोग वायु के समान है, भगवान क भाव लेकर के महात्मा लोग सबको भगवान क स्वरूप बना देते है। आज वायु ही भगवान क रूप धारण कर के आया है। भगवान ही मेघ क रूप धारण करके मेघ की वर्षा कर रहे है। महात्मा से हम संसार की कामना करली तो ठीक नहीं क्योंकि हमको जो मुक्ति मिलने वाली थी वह सांसारिक लाभ में रह गये। आपने अज्ञान के कारण थोड़े ही लाभ में रह गये।

भगवान की आकाशवाणी होवे थाने सब में से एक ने दर्शन दे सकू हूं - किन देऊ बताओ? कोई बोले मुझे दर्शन देदो, और न चाहे देवो चाहे नहीं, तो दर्शन नहीं होवेगा। यदि आपा या कैवा, मने छोड़कर और थारे जचे जिके ने देवो, तो स्वार्थ को त्याग करने से सबको दर्शन हो गया। (पैड १०७ पृष्ठ १९)


जितने संसार के प्राणी है उनकी सेवा के लिये अपना सारा शरीर उसके अर्पण कर देता है उसको ये मालूम होता है कि मैं परमात्मा की सेवा करता हूँ। एक सेवा तो शरीर की है, वह तो लौकिक है। नाम जप कीर्तन है, वह पारलौकिक सेवा है।

सत्वगुण की वृद्धि में महापुरुषों के पास रहना चाहिये। वहाँ रह कर वे जैसे कहे वैसे करता रहे। ऎसा करने से एक क्षण में परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। अपने में योग्यता आनेपर थोड़े से उपदेश से क्षणमात्र में ही उसको परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है।

सिद्धान्त की जो बात है उनको पालन करने वाला, प्रचार करने वाला भगवान को पाता है। असली तो वह प्रचारक है जो आचरण में लाता है। नियम से करता है वह सर्वस्व प्रिय है। सत्संग की बातें सुनने के समय ये रखें कि मैं दूसरे को भी कहूँगा। इस भाव से जो सुनता है उसका पालन होता है।



घर के अन्दर अतिथि आवे तो उसको साक्षात नारायण के रूप में समझना चाहिये, कि भगवान ही इसी रूप में आकर भोग लगा रहे है। ऎसे ही कुत्ता, बिल्ली, गाय, बड़ वृक्ष, तुल्सी, पीपल में भी यही भाव करना चाहिये। श्रद्धा होने से आपको शान्ति मिलेगी और ऎसा मालूम पड़ेगा कि साक्षात नारायण ही इसी रूप में सेवा करा रहे है।


जीतेजी मुर्दा बन जावे उसी का नाम जीवन मुक्त है। जैसे शुकदेवजी के ऊपर चाहे धूल गेरे चाहे पुष्प, समान ही है। तृण से भी नीचो और वृक्ष की तरह सहनशील हो जाना चाहिये।

मान बड़ाई

अपने को कोई मान देवे, बड़ाई देवे इसकी चाहना स्वाभाविक बात है। अनन्तकाल से है। कोई आज की नहीं। स्वत: सिद्ध ही है। यह राग है, मनुष्य की बीमारी है। इसकी औषधी नहीं है। चेष्टा करे तो मिट सके।

मान बड़ाई जैसी खतरे की चीज से बचने के लिये गहरो विचार नहीं करा हाँ। शास्त्र इसे विष के तुल्य बतावे। इसे प्लेग की बिमारी समझे। विचार करे, सोचे कि इसका क्या नतीजा है। इसका नतीजा यही निकले कि यह बड़ी खतरनाक चीज है। विचार करे तो दोष घट नहीं सके।


जैसे पतंगे दीपक पर पड़ पड़ कर भस्म हो जाते हैं वैसे यह विष्यों के भोग हैं। सुख बुद्धि है इससे आसक्ति है। यह अज्ञान है। कैसे हटे? ईश्वर, महापुरुषों की कृपा से आसक्ति को भीतर से माजे, खूब घर्षण करे, फिर नाश हो जावे। ईश्वर दयालू है। दया आजावे तो आप ही आप कर देवे।
प्रश्न : विषयों में सुख बुद्धि कैसे हटे?
उत्तर : शास्त्रों में, महात्माओं में, किसी में श्रद्धा कर लेवे, तब भी काम बन जावे। परन्तु उसमें संशय, पदार्थों में आसक्ति, सुख बुद्धि विषयों में, यही कारण है और स्वार्थ की मात्रा इतनी बढ़ी हुई कि चकाचौंध हो रहे हैं। सूझता ही नहीं। मोहित हो रहे हैं। भगवान कहते हैं

शरण चले जावे तो बेड़ा पार है।
काम क्रोध लोभ बुरी चीज है। विचार द्वारा समझते हैं। हटाना भी चाहते हैं पर काम पड़ता है तो स्वभाव के दोष से कठिनाई पड़ जाती है। वह हटे कैसे? ईश्वर महात्मा शास्त्र में श्रद्धा करे। उसे वीरता द्वारा हटावे। निश्चय बिना शूरवीरता आवे नहीं। बार बार निश्चय करे और जोर लगावे तो हट सके।
इन्द्रियों तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं। जितने पदार्थ भोग हैं, दु:ख स्वरूप हैं, आदि अन्त वाले हैं। अनित्य हैं। जो जानते हैं वे नहीं रमते। असली चीज वैराग्य है। वैराग्य उपरति बनी रहे उसके लिये जप ध्यान स्वाध्याय सत्संग करता ही रहे। एक उपाय और है - भगवान के सामने रोवे। रोता ही रहे। इससे भी काम बन जावे। जोश देने से भी काम बन जावे। खूब जोश दिलावे। अपने तो धर्मात्मा बनना है। यह दृष्टि कायम रखें। तो फिर आत्मबल होकर काम सिद्ध हो जावे। वैराग्य, विवेक, उपरति, श्रद्धा, चारों बड़ी दामी है। वैसे ही जैसे जप ध्यान स्वाध्याय सत्संग बड़ी मददकारी हैं। श्रद्धा और विवेक हो तो वह चीजें बड़ी दामी हो जावे। यह बातें समझ बुज कर निर्णय करी हुई है। इनमें शंका सन्देह नहीं। अलीक है, हटा नहीं सके कोई। बहुत सी दामी चीजें हैं जिनको मनुष्य को इकट्ठा करनी चाहिये - कोई होने की कोई करने की है।
वैराग्य, विवेक, उपरति, श्रद्धा, चारों बड़ी दामी है। वैसे ही जैसे जप ध्यान स्वाध्याय सत्संग बड़ी मददकारी हैं। श्रद्धा और विवेक हो तो वह चीजें बड़ी दामी हो जावे। यह बातें समझ बुज कर निर्णय करी हुई है। इनमें शंका सन्देह नहीं। अलीक है, हटा नहीं सके कोई। बहुत सी दामी चीजें हैं जिनको मनुष्य को इकट्ठा करनी चाहिये - कोई होने की कोई करने की है।

ध्यान सहित माला का नीयम ले ले। पहले थोड़ा नीयम ले, फिर थोड़ा बढ़ावे। कलियुग में हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे - ये मन्त्र चोखा है। अपने इष्ट के मुखार्विन्द पर दृष्टि गढ़ावे, विनय भाव से प्रार्थना करे - प्रभो कुछ नहीं चाहिये। स्त्री धन पुत्र आदि कुछ नहीं। केवल आपका प्रेम चाहिये।
एकान्त में रहकर भगवान की शरण हो कर दीनभाव से प्रार्थना करे -

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम ॥ गीता२/७॥

इस श्लोक का एकान्त में जाकर बैठकर यह श्लोक पढें। श्लोक अर्थ चित्त में बैठाने से सारे काम सिद्ध हो जावे।
आकाश की ज्यों वह परमात्मा सब जगह आनन्दरूप से विराजमान हो रहा है। चलता बैठता उठता सोता भगवान को याद रखें। कोई वेग सतावे तो भगवान को बुलावे। जैसे चोर के लिये सिपाही को बुलाते हैं। वैसे ही भगवान को पुकार लगाने से वह ठहर नहीं सकता।
काम क्रोध आदि का वेग होवे तो भगवान को पुकारे - हे नाथ हे नाथ! जैसे चोर आने पर पुलीस को पुकारे। बार बार विलाप करे - हे गोविन्द, हे दीनबन्धु, हे हरि, आपके देखते हुए यह सब मेरी दुर्दशा हो रही है। इस तरह पुकार लगाने से वे काम क्रोध ठहर नहीं सकते।
शान्ति के वचन ही जल हैं। क्रोध आने वाले के अनुकूल वचन कहे। शान्ति से कहे, तो वह ठन्डा नरम हो जाता हैI

मन के विपरीत जो कुछ होता है वह हमारे पाप का फल और ईश्वर का विधान है। यह समझ जावे तो क्रोध नहीं आवे।
हमे ईश्वर का विधान को ईश्वर का भेजा हुआ पुरस्कार समझकर प्रसन्न होकर सिर चढ़ाना चाहिये। यदि हम रोवेंगे, दु:ख करेंगे, तो भगवान समझेंगे कि यह मेरे भरोसे पर नहीं है।

हमारा कर्तव्य है हम तो क्रोध करे ही नहीं। पर कोई हम पर क्रोध करे तो भी उस पर क्रोध नहीं करना चाहिये। जो क्रोध करता है तो समझे कि मेरे से ही कोई कसूर हुआ है। किसी को भी क्रोध आवे तो उसका नहीं बल्कि अपना कसूर कायम करे।
दूसरे को क्रोध आने पर भक्त सोचता है कि मेरे द्वारा कोई ऐसी प्रतिकूल क्रिया हुई है जिससे इसे क्रोध आया है। यदि मुझे अपना सुधार करना है तो अपने को क्रोध नहीं आने देना चाहिये। अतिथि को जिलाकर भूखे रहना पड़े तो उस उपवास का फल २४ एकादशीयों से भी बढ़कर है। यह महा यज्ञ है।
अतिथि सेवा महायज्ञ है क्योंकि उसकी आत्मा की तृप्ति होने से साई आत्माओं की तृप्ति हो जाती है।
वैराग्य ऐसा हो कि कोई प्रबन्ध में भी टाइम नहीं लगावे। चाहे कोई आवो चाहे कोई जाओ। वैराग्य धारण करने की चीज है। कोई वक्त बात हो गई तो हो गई नहीं तो अपने ध्यान में मस्त रहे। वैराग्य और उपरामता दोनों ही रखें तो गृहस्थ में भी सन्यास है।
गंगा तट और वट का वृक्ष दोनों यहाँ स्वाभाविक ही हैं। आजीविका का प्रबन्ध हो जाये तो यही अकेला रहे। यहाँ का स्थान वैराग्यमय है ही और इस पर गीता और महाभारत का वैराग्य का प्रसंग चले तो भोगी को भी वैराग्य हो जाय और यदि वक्ता पुरुष भी शुकदेवजी जैसा हो तब तो कहना ही क्या है। मनुष्य जैसा सुनता और देखता है वैसी ही वृत्तियाँ बन जाती है और वह भी वैसा ही बन जाता है।

देखो कैसी शान्ति है आनन्द है, वायु में कैसी भगवती गंगा की गन्ध है। क्यों न हो। क्योंकि गंगा भगवान के चरणों का जल है। जैसे हम कस्तूरी या कपूर को धोवे तो जलमें गन्ध आजाती है। इसी प्रकार इसमें भगवान के चरणों की गन्ध आगयी है।
यह युक्ति बड़ी अच्छी है। किसी तरह समझ में आजावे तो एक क्षण में कल्याण हो जाता है। जैसे स्वप्न में दु:ख पाने वाले को उठा दे तो उसी क्षण दु:ख दूर हो जाता है। वैसे ही हम भी स्वप्न में हैं। कोई महापुरुष जगा सकते हैं।
पुत्र स्त्री आदि को अपना मानना मूर्खता है। यही बन्धन है। जैसे स्वप्न की वस्तु जागृत में नहीं लाई जा सकती है उसी तरह इस जगत की चीजें मरने पर साथ नहीं चलेगी।
जब तक शरीर में मेरेपन का भाव है तभी तक दु:ख होता है। जब शरीर में मेरा पन नहीं रहेगा तो शरीर को चाहे कोई आग लगा दे या टुकड़े टुकड़े कर दे तो भी दु:ख नहीं होगा।
जो भगवान के नाम का जप और स्वरूप का ध्यान करता रहता है उसे भगवान स्वयं आकर दर्शन देते हैं।
एक बार भगवान का ध्यान हो गया तो तुम्हारे बाप की ताकत नहीं कि उधर से मन को हटा सके क्योंकि वह रस राज है। भगवान कहते हैं कि मैं वैकुण्ठ को त्याग देता हूँ पर जहाँ मेरे भक्त बैठते हैं गाते हैं मैं वहीं रहता हूँ। "नाहं वसामि वैकुण्ठ"।

असली बात तो यह कि हर जगह भगवान को देखकर प्रसन्न होवे और भगवान है, उनकी प्रेम और दया की दृष्टि है, वे हमें प्रेम दृष्टि से देख रहे हैं, ऐसा मानने से ही शान्ति मिलती है। इसमें करना कुछ नहीं है केवल मानना ही है।

भगवान दयालू है, सुहृद हैं, यह भाव मन में पक्का जम जावे तो आप ही भजन होने लगे। जैसे किसी ने हमारा बहुत अपकार किया हो तो उसकी कितनी याद आती है। उसकी सुहृदता और भगवान की सुहृदता में लाखों करोड़ों गुणा फर्क है। तो अब अन्दाज लगाये कि उसका कितना भजन होना चाहिये।
भगवान हमारे सुह्रद हैं, उनका हमारे सिर पर हाथ है। नहीं दीखने पर भी वह हमारे पास हैं। कोई कहे कि हम समझते हैं फिर भी शान्ति नहीं होती तो यह मानने में कमी है। मानने के साथ शान्ति अवश्य निश्चय मिलती है।
यदि भगवान को हम सुह्रद मान ले और वे हम पर प्रसन्न है, उनकी हम पर पूर्ण दया और प्रेम है तो हमे फिर क्या करना पड़े, फिर साधन भी क्या करना पड़े। साधन भजन ध्यान तो स्वत: होगा। करना नहीं पड़ेगा। भगवान की स्मृति बराबर रहेगी।
मन से भगवान्‌ के स्वरूप का स्मरण, वाणि से भगवान्‌ का नाम और शरीर से सब की सेवा करनेवाला भगवान्‌ को प्राप्त हो जाता है।

माटी डालनेवाला यदि स्वार्थ त्यागकर सेवा करता है तो उसकी मुक्ति हो जाती है। पर यदि कोई लौकिक कामना रखकर ध्यान करता है तो वह माटी डालनेवाले कर्म से नीचा है।
माता बहनों का उद्धार तो इसलिये शीघ्र हो जाता है कि उसका आधा पाप पति को चला जाता है और पति का पुण्य भी वह आधा ले लेती है। पति का पाप नहीं लगता। और पतिव्रता हुई तो पति को भी परमगति करवा देती है।
यहा आकर मन इन्द्रियों का संयम करना चाहिये। यह नहीं कि यहा खूब मालपुआ खावे और ऐश आराम करे। ऐश आराम करना हो तो घर पर ही करे, यहा आने की जरूरत नहीं है। साधु ब्राह्मणों कि तन, मन और वस्तुऒं से सेवा करे। सत्संग करना, भजन ध्यान करना, उसका प्रचार करना - ऐसा समय बितानेवाले को यहाँ आना चाहिये।
माता बहनों के लिये एक बहुत दामी बात है - उसमें सहज ही कल्याण हो सकता है। सबके साथ व्य्वहार हँस कर करना। कोई क्रोध करे तो अपने क्रोध नहीं करना। हँस करके प्रेम से बोलना और अपने व्य्वहार से मुग्ध कर देना।
विष खानेवाला एक बार ही मरता है पर विषयों का सेवन करनेवाला करोड़ो बार जन्मता और मरता रहता है। जो मनुष्य शरीर पाकर खाने पीने, स्वाद शौकीनी में समय बिताता है, उसमें और पशु में क्या अन्तर है। मखमल के गद्दे पर जो सुख आता है वही गधे को राख पर आता है।


परमात्मा की प्राप्ति को छोड़कर जो विषय ग्रहण करता है वह महा मूर्ख है। यह मनुष्य शरीर आत्मा के उद्धार के लिये मिला है। कब मृत्यु होगी, पता नहीं। आज मौत आजावेगी तो नहीं कह सकेंगे कि कल जावेंगे। जल्दि ही काम बना लेना चाहिये।
परमात्मा ने घोषना कर रखी है कि जबतक जीवन है तब तक भजन ध्यान का साधन कर के परमात्मा की प्राप्ति का लाभ उठा लेना चाहिये। समझदारी, बुद्धिमानी इसी में है कि शीघ्र से शीघ्र, अति शीघ्र भजन ध्यान का साधन करके अपना काम बना लेना चाहिये।
धन मकान आदि मेरापन याने ममता की चीज है वे दूसरों के उपकार में याने दीन दु:खी अनाथ की सेवा में लगा देवे। मर गये तो धन दौलत स्त्री सबसे सम्बन्ध उठ गया। हम पहले भी कहीं थे, वहाँ भी क्या छोड़कर आये पता नहीं। इसी तरह यहाँ से जाने पर यहाँ का भी कोई पत्ता नहीं रहेगा। इसलिये जब तक शरीर में प्राण है तब तक कल्याण कर लेना चाहिये। (पैड ११३ पष्ठ ५१)
सबसे बड़ी दामी बात - मनुष्य शरीर में ही कल्याण हो सकता है। उत्तम से उत्तम आनन्द मनुष्य शरीर में प्राप्त होता है। जब भगवान ने ज्ञान बुद्धि दी है तो हमे ऐसी दशा में दुखों का अत्यन्त अभाव कर के अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति कर ले। कुत्ते को बुलाकर उपदेश करे तो वह समझेगा ही नहीं। आपको मनुष्य शरीर दिया है तो आपका पहला कर्तव्य है कि इस आनन्द के लिये प्रयत्न करे।
परमात्मा का सुख ऐसा है कि जब आप उस सुख को प्राप्त हो जावेंगेतब आपके मन में कोई इच्छा नहीं रहेगा। जैसे घड़ा जल से भर जाता है वैसे ही आनन्द पूर्ण हो जावेगा। (पैड ११३ पष्ठ ५२)
हमें कोई कुत्ता गधा कह दे तो नारज होते हैं पर याद रखो कि परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी तो न मालूम कितनी बार कुत्ते गधे बनोगे। जनम मृत्यु का फिर तो समुद्र ही भरा है। 

तुम कहते हो आज जरूरी काम हो गया, सत्संग में जाना नहीं हुआ। आग लगे वैसे काम में, जिससे हमारा जरूरी काम बाकी रह जाये। मुझे बताओ तुम्हारा यह काम रह जायगा, तो कौन करेगा। वह तो तुम्हारे करे ही होगा। दूसरा कोइ नहीं करेगा।

ये नेत्र दो कैमरे हैं। इनसे सारा फोटो हमारे ह्रदय में इकट्ठा होता है। हरे रंग के चश्मे से सब कुछ हरा दीखता है। इसी प्रकार हरि के नाम का चश्मा चढ़ा लो तो सब संसार हरिमय दीखेगा। जर्रे जर्रे में अनु अणु में परमात्मा दीखेंगे।
भगवान ने आपको मौका दिया है, इसे मत लात मारो। यदि चेत जावोगे तो ठीक है, कबीरजी सावधान कर रहे हैं -

कबीरा नौबत आपनी दिन दश लेहु बजाय

यह पुर पट्टन यह गलि, बहुरी न देको आय।

हाड़ जले ज्यों लाकड़ी केश जले ज्यों घाँस

सब जग जलता देखके भये कबीर उदास।

मरोगे मरजावोगे, कोई न लेगा नाम

उजड़ जाय बसाओगे छाड़ी बसन्ता गाम।

यह सब सोचकर जल्दी अपना काम बना लेना चाहिये।

गंगा किनारे किनारे आप कलकत्ते तक चले जाइये पर ऐसा दृश्य नहीं मिलेगा। यहाँ तो ऐसा स्थान है कि हम बारह महीने रहे तो उत्तम है। एक तो यह कि हमारा प्रारब्ध नहीं है और दूसरे भोगों के कारण यहाँ हमेशा रहना कठिन है।
गंगा की ध्वनि वेद ध्वनि सी मालूम होती है। इस ध्वनि में नाम जप को भी जोड़ सकते हैं। गंगाजी के दर्शन से नेत्र और ह्रदय पवित्र हो जाते हैं। नेत्रों की दोष दृष्टि मिट जाती है और ह्रदय में जाकर यह बहुत काम करती है।

नारायण नारायण नारायण
नारायण के नाम की ध्वनि सारे विक्षेपो का नाश कर देता है। प्रत्यक्ष में यह बात है। विशेष एक तार ध्वनि हो जाने पर तो मन स्वाभाविक एकाग्र हो जाता है।

संसार का स्मरण करना ही मौत का, काल का या विष का चिन्तन करना है। भूल से हो जावे तो उसी वक्त त्याग कर दे।

बस एक आनन्द के सिवा कोई पदार्थ है ही नहीं। दूसरा पदार्थ प्रतीत हो तो सोचे जैसे स्वप्न में, मरू भूमि में जल या आकाश में तिरविरा दीखता है, वैसा ही समझे।
नारायण नारायण आनन्दमय आनन्दमय पूर्णानन्द। यह आनन्द की ध्वनि, आनन्द की गर्जना से आनन्द ही आनन्द परिपूर्ण हो जाती है। आनन्द से शरीर में रोमांच, धरधरी और कम्प होने लगता है।
एकान्त देश में यह ज्ञान का साधन बतलाया है। "विविक्त देश सेवित्वं मरतिर्जनसंसदि" गीता १३/१०। यहाँ एकान्त है हि। साधक जन समुदाय में नहीं गिने जाते है। यहाँ का वातावरण भी अनुकूल है और व्याख्यान भी। निराकार का व्याख्यान साकार में भी सहायक है क्योंकि निराकार साकार यह सब मिलकर ही समग्र रूप हैं।

यहाँ कोई भी विघ्न आ ही नहीं सकते। यदि आ जावे तो गीता का पाठ कर दिया तो सब भाग जावे।
यदि तुम्हारे ऊपर काम क्रोध का वेग आजावे तो हे नाथ! हे नाथ! पुकारे। फिर आ ही नहीं सकते।
सब जगह शान्ति का सामराज्य है तो फिर वैसा ही हो जायेगा। आप जो कुछ मानोगे वह हो जायेगा। अप दृढ़ भावना कर लेवे।
यमराज अपने किंकरों से कहते हैं जहाँ भगवान का कीर्तन जप ध्यान होता है वहाँ मत जाना। नहाँ भगवान गुप्त रूप से रहते हैं। और कुछ भी नहीं तो सब जगह भगवान ही भगवान का दर्शन करे।

"वासुदेव सर्वमिति" गीता ७/१९।
भींत की तरह सहनशील हो जावे। बोल नहीं मारे। निन्दा नहीं करे। दूसरा कोई भी करे निन्दा, सच्ची या झूठी। यदि सच्ची है तो अपने दोष ने हटावे, झूठी है तो भींत बन जावे।
अनिष्ट करने वाले का भी भला करे। बदी करने वाले के साथ बदी, नेकी के साथ नेकी, तो ये तो गधे कुत्ते में भी है। यह बात यदि मनुष्यों में भी है तो मनुष्यों की क्या विशेषता रही।
परमात्मा का भजन ध्यान साक्षात अमृत है। उस माय समय लागाने के लिये तत्परता सू कोशिश करे। मन न या बात समझावे कि संसार का, भोगा क चिन्तन करना तो जन्म मरण की बीमारी देने वाली है। जैसे रोगी ने कुपथ्य चोखी लागे। इस प्रकार भोगों का सेवन कुपथ्य है। इसलिये विचार के द्वारा विश्वास कर कर बलातकार से भजन ध्यान के काम माय लाग पड़ तो ये दोष मिटने सके छे।


प्रश्न: ऐसि कौनसी बात है जो कि म्हारे कल्याण होने में बाधक हैं?
उत्तर : अकर्मण्यता - प्रवृत्ति नहीम होना
आलस्य - कर लेस्या, कर लेस्या, काम करने में विलम्ब
दीर्घसूत्रता - थोड़ा काम माय भोत समय लगा दियो याने ढीली
निरुत्साह - प्रवृत्त होया पण उत्साह नहीं है।
तत्परता मायं बाधा करने वाला यही सब दोष हैं।
भजन ध्यान की क्रिया अच्छी है पर भाव की कमी है तो वह भोत ऊँची नहीं है। साम्सारिक व्यवहारिक क्रिया देखने माय तो नीची है पण भाव ऊँचो है तो वह ऊँची है।
भगवान माय प्रेम चाहे जद ही कर लेवो, वो तो प्रेम करने ताई तैयार है, चाहे अज ही करलो। उसने दूसरा को प्रेम अच्छो लाग नहीं।
म्हे तो सगला की भजन ध्यान करानो चावाहां। याने सगला ने भजन ध्यान मायं लगानो चावाहां। पर हमारो करो के होवे है। करसो तो आगला के ही होसी।
यह विश्वास होय जावे भगवान कह्यो है

अनन्य चेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्य युक्तस्य योगिन:। गीता ८/१४।


मैं उसके लिये सुलभता से प्राप्त हो जाऊँ - ये भगवान के वचन लोहे की लीक हैं। ये भगवान के वचन हैं। जदी भगवान ही प्राप्त हो गया जना बाकी रयो ही के।
गुप्त धन है भजन का। उसकी यहाँ भी दर है और वहाँ भी।
किसी भी मार्ग में चलो विषमता मिटाने की बात भगवान सभी मर्ग में बतलावेंगे। विषमता विष है समता अमृत है।
मान बड़ाई प्रतिष्ठा को अपमान सा समझे और अपमान को अच्छा समझे। यह विषमता दिखने पर भी यह समता से बढ़कर है।

नीच पुरुषां को याद करने सु, उसका कृत्य याद करने सु, आपने उसके ऊपर घृणा हुव, इससु आपनो हॊ पतन होव। घृणा से आपनो ही नुकसान है।
भगवान्‌ की निरन्तर स्मृति से फिर मन से प्रत्यक्ष भगवान्‌ दीखने लग जाते है। दीखते दीखते प्रकट हो जाते है।
हमको कोई चीज को हटाने की जरूरत नहीं है। चीजों में भगवान्‌ की भावना करनी चाहिये।
विश्वास तो हम लोगों का है पर शंकायुक्त है। जब पूरा विश्वास हो जायगा तो नुकसान के नेड़े नहीं जायगा।
मन को दौड़ने से जितनी हटानी है उतनी शरीर से नहीं है।
भजन के लिये कम से कम तीन घण्टा तो जरुर रकनी चाहिये। बात तो यही अच्छी है कि हर समय भजन ही किया करो। पण मन एक जग टिकता नहीं इसलिये इसको कुछ काम देकर फिर भजन में लग जावे। प्रधानता भजन की रखे।

॥श्रीहरि:॥

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