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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.

Saturday, April 28, 2012

शिवसहस्त्रनाम


शिवसहस्त्रनाम


शिवसहस्त्रनाम
(भगवान शिव) 
शिव सहस्त्रनाम
ॐ स्थिराय नमः॥
ॐ स्थाणवे नमः॥
ॐ प्रभवे नमः॥
ॐ भीमाय नमः॥
ॐ प्रवराय नमः॥
ॐ वरदाय नमः॥
ॐ वराय नमः॥
ॐ सर्वात्मने नमः॥
ॐ सर्वविख्याताय नमः॥
ॐ सर्वस्मै नमः॥ 
ॐ सर्वकाराय नमः॥
ॐ भवाय नमः॥
ॐ जटिने नमः॥
ॐ चर्मिणे नमः॥
ॐ शिखण्डिने नमः॥
ॐ सर्वांङ्गाय नमः॥
ॐ सर्वभावाय नमः॥
ॐ हराय नमः॥
ॐ हरिणाक्षाय नमः॥
ॐ सर्वभूतहराय नमः॥ 
ॐ प्रभवे नमः॥
ॐ प्रवृत्तये नमः॥ 
ॐ निवृत्तये नमः॥ 
ॐ नियताय नमः॥ 
ॐ शाश्वताय नमः॥ 
ॐ ध्रुवाय नमः॥ 
ॐ श्मशानवासिने नमः॥ 
ॐ भगवते नमः॥ 
ॐ खेचराय नमः॥ 
ॐ गोचराय नमः॥ 
ॐ अर्दनाय नमः॥ 
ॐ अभिवाद्याय नमः॥ 
ॐ महाकर्मणे नमः॥ 
ॐ तपस्विने नमः॥ 
ॐ भूतभावनाय नमः॥ 
ॐ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नाय नमः॥ 
ॐ सर्वलोकप्रजापतये नमः॥ 
ॐ महारूपाय नमः॥ 
ॐ महाकायाय नमः॥ 
ॐ वृषरूपाय नमः॥ 
ॐ महायशसे नमः॥ 
ॐ महात्मने नमः॥ 
ॐ सर्वभूतात्मने नमः॥ 
ॐ विश्वरूपाय नमः॥ 
ॐ महाहनवे नमः॥ 
ॐ लोकपालाय नमः॥ 
ॐ अंतर्हितात्मने नमः॥ 
ॐ प्रसादाय नमः॥ 
ॐ हयगर्दभाय नमः॥ 
ॐ पवित्राय नमः॥ 
ॐ महते नमः॥
ॐ नियमाय नमः॥ 
ॐ नियमाश्रिताय नमः॥ 
ॐ सर्वकर्मणे नमः॥ 
ॐ स्वयंभूताय नमः॥ 
ॐ आदये नमः॥ 
ॐ आदिकराय नमः॥ 
ॐ निधये नमः॥ 
ॐ सहस्राक्षाय नमः॥ 
ॐ विशालाक्षाय नमः॥ 
ॐ सोमाय नमः॥ 
ॐ नक्षत्रसाधकाय नमः॥ 
ॐ चंद्राय नमः॥ 
ॐ सूर्याय नमः॥ 
ॐ शनये नमः॥ 
ॐ केतवे नमः॥ 
ॐ ग्रहाय नमः॥ 
ॐ ग्रहपतये नमः॥ 
ॐ वराय नमः॥ 
ॐ अत्रये नमः॥ 
ॐ अत्र्यानमस्कर्त्रे नमः॥ 
ॐ मृगबाणार्पणाय नमः॥ 
ॐ अनघाय नमः॥ 
ॐ महातपसे नमः॥ 
ॐ घोरतपसे नमः॥ 
ॐ अदीनाय नमः॥ 
ॐ दीनसाधककराय नमः॥ 
ॐ संवत्सरकराय नमः॥ 
ॐ मंत्राय नमः॥ 
ॐ प्रमाणाय नमः॥ 
ॐ परमन्तपाय नमः॥ 
ॐ योगिने नमः॥ 
ॐ योज्याय नमः॥ 
ॐ महाबीजाय नमः॥ 
ॐ महारेतसे नमः॥ 
ॐ महाबलाय नमः॥ 
ॐ सुवर्णरेतसे नमः॥ 
ॐ सर्वज्ञाय नमः॥ 
ॐ सुबीजाय नमः॥ 
ॐ बीजवाहनाय नमः॥ 
ॐ दशबाहवे नमः॥ 
ॐ अनिमिषाय नमः॥ 
ॐ नीलकण्ठाय नमः॥ 
ॐ उमापतये नमः॥ ॐ
 विश्वरूपाय नमः॥ 
ॐ स्वयंश्रेष्ठाय नमः॥ 
ॐ बलवीराय नमः॥ 
ॐ अबलोगणाय नमः॥ 
ॐ गणकर्त्रे नमः॥ 
ॐ गणपतये नमः॥
ॐ दिग्वाससे नमः॥ 
ॐ कामाय नमः॥ 
ॐ मंत्रविदे नमः॥ 
ॐ परममन्त्राय नमः॥ 
ॐ सर्वभावकराय नमः॥ 
ॐ हराय नमः॥ 
ॐ कमण्डलुधराय नमः॥ 
ॐ धन्विते नमः॥ 
ॐ बाणहस्ताय नमः॥ 
ॐ कपालवते नमः॥ 
ॐ अशनिने नमः॥ 
ॐ शतघ्निने नमः॥ 
ॐ खड्गिने नमः॥ 
ॐ पट्टिशिने नमः॥ 
ॐ आयुधिने नमः॥ 
ॐ महते नमः॥ 
ॐ स्रुवहस्ताय नमः॥ 
ॐ सुरूपाय नमः॥ 
ॐ तेजसे नमः॥ 
ॐ तेजस्करनिधये नमः॥ 
ॐ उष्णीषिणे नमः॥ 
ॐ सुवक्त्राय नमः॥ 
ॐ उदग्राय नमः॥ 
ॐ विनताय नमः॥ 
ॐ दीर्घाय नमः॥ 
ॐ हरिकेशाय नमः॥ 
ॐ सुतीर्थाय नमः॥ 
ॐ कृष्णाय नमः॥ 
ॐ श्रृगालरूपाय नमः॥ 
ॐ सिद्धार्थाय नमः॥ 
ॐ मुण्डाय नमः॥ 
ॐ सर्वशुभंकराय नमः॥ 
ॐ अजाय नमः॥ 
ॐ बहुरूपाय नमः॥ 
ॐ गन्धधारिणे नमः॥ 
ॐ कपर्दिने नमः॥ 
ॐ उर्ध्वरेतसे नमः॥ 
ॐ उर्ध्वलिंगाय नमः॥ 
ॐ उर्ध्वशायिने नमः॥ 
ॐ नभस्थलाय नमः॥ 
ॐ त्रिजटाय नमः॥ 
ॐ चीरवाससे नमः॥ 
ॐ रूद्राय नमः॥ 
ॐ सेनापतये नमः॥ 
ॐ विभवे नमः॥ 
ॐ अहश्चराय नमः॥ 
ॐ नक्तंचराय नमः॥ 
ॐ तिग्ममन्यवे नमः॥ 
ॐ सुवर्चसाय नमः॥ 
ॐ गजघ्ने नमः॥ 
ॐ दैत्यघ्ने नमः॥ 
ॐ कालाय नमः॥ 
ॐ लोकधात्रे नमः॥ 
ॐ गुणाकराय नमः॥ 
ॐ सिंहसार्दूलरूपाय नमः॥ 
ॐ आर्द्रचर्माम्बराय नमः॥ 
ॐ कालयोगिने नमः॥ 
ॐ महानादाय नमः॥ 
ॐ सर्वकामाय नमः॥ 
ॐ चतुष्पथाय नमः॥ 
ॐ निशाचराय नमः॥ 
ॐ प्रेतचारिणे नमः॥ 
ॐ भूतचारिणे नमः॥ 
ॐ महेश्वराय नमः॥ 
ॐ बहुभूताय नमः॥ 
ॐ बहुधराय नमः॥ 
ॐ स्वर्भानवे नमः॥ 
ॐ अमिताय नमः॥ 
ॐ गतये नमः॥ 
ॐ नृत्यप्रियाय नमः॥ 
ॐ नृत्यनर्ताय नमः॥ 
ॐ नर्तकाय नमः॥ ॐ
 सर्वलालसाय नमः॥ 
ॐ घोराय नमः॥ 
ॐ महातपसे नमः॥ 
ॐ पाशाय नमः॥ 
ॐ नित्याय नमः॥ 
ॐ गिरिरूहाय नमः॥ 
ॐ नभसे नमः॥ 
ॐ सहस्रहस्ताय नमः॥ 
ॐ विजयाय नमः॥ 
ॐ व्यवसायाय नमः॥ 
ॐ अतन्द्रियाय नमः॥ 
ॐ अधर्षणाय नमः॥ 
ॐ धर्षणात्मने नमः॥ 
ॐ यज्ञघ्ने नमः॥ 
ॐ कामनाशकाय नमः॥ 
ॐ दक्षयागापहारिणे नमः॥ 
ॐ सुसहाय नमः॥ 
ॐ मध्यमाय नमः॥ 
ॐ तेजोपहारिणे नमः॥ 
ॐ बलघ्ने नमः॥ 
ॐ मुदिताय नमः॥ 
ॐ अर्थाय नमः॥ 
ॐ अजिताय नमः॥ 
ॐ अवराय नमः॥ 
ॐ गम्भीरघोषाय नमः॥ 
ॐ गम्भीराय नमः॥ 
ॐ गंभीरबलवाहनाय नमः॥ 
ॐ न्यग्रोधरूपाय नमः॥
ॐ न्यग्रोधाय नमः॥ ॐ वृक्षकर्णस्थितये नमः॥ ॐ विभवे नमः॥ ॐ सुतीक्ष्णदशनाय नमः॥ ॐ महाकायाय नमः॥ ॐ महाननाय नमः॥ ॐ विश्वकसेनाय नमः॥ ॐ हरये नमः॥ ॐ यज्ञाय नमः॥ ॐ संयुगापीडवाहनाय नमः॥ ॐ तीक्ष्णतापाय नमः॥ ॐ हर्यश्वाय नमः॥ ॐ सहायाय नमः॥ ॐ कर्मकालविदे नमः॥ ॐ विष्णुप्रसादिताय नमः॥ ॐ यज्ञाय नमः॥ ॐ समुद्राय नमः॥ ॐ वडमुखाय नमः॥ ॐ हुताशनसहायाय नमः॥ ॐ प्रशान्तात्मने नमः॥ ॐ हुताशनाय नमः॥ ॐ उग्रतेजसे नमः॥ ॐ महातेजसे नमः॥ ॐ जन्याय नमः॥ ॐ विजयकालविदे नमः॥ ॐ ज्योतिषामयनाय नमः॥ ॐ सिद्धये नमः॥ ॐ सर्वविग्रहाय नमः॥ ॐ शिखिने नमः॥ ॐ मुण्डिने नमः॥ ॐ जटिने नमः॥ ॐ ज्वालिने नमः॥ ॐ मूर्तिजाय नमः॥ ॐ मूर्ध्दगाय नमः॥ ॐ बलिने नमः॥ ॐ वेणविने नमः॥ ॐ पणविने नमः॥ ॐ तालिने नमः॥ ॐ खलिने नमः॥ ॐ कालकंटकाय नमः॥ ॐ नक्षत्रविग्रहमतये नमः॥ ॐ गुणबुद्धये नमः॥ ॐ लयाय नमः॥ ॐ अगमाय नमः॥ ॐ प्रजापतये नमः॥ ॐ विश्वबाहवे नमः॥ ॐ विभागाय नमः॥ ॐ सर्वगाय नमः॥ ॐ अमुखाय नमः॥ ॐ विमोचनाय नमः॥
ॐ सुसरणाय नमः॥ ॐ हिरण्यकवचोद्भाय नमः॥ ॐ मेढ्रजाय नमः॥ ॐ बलचारिणे नमः॥ ॐ महीचारिणे नमः॥ ॐ स्रुत्याय नमः॥ ॐ सर्वतूर्यनिनादिने नमः॥ ॐ सर्वतोद्यपरिग्रहाय नमः॥ ॐ व्यालरूपाय नमः॥ ॐ गुहावासिने नमः॥ ॐ गुहाय नमः॥ ॐ मालिने नमः॥ ॐ तरंगविदे नमः॥ ॐ त्रिदशाय नमः॥ ॐ त्रिकालधृगे नमः॥ ॐ कर्मसर्वबन्ध-विमोचनाय नमः॥ ॐ असुरेन्द्राणां बन्धनाय नमः॥ ॐ युधि शत्रुवानाशिने नमः॥ ॐ सांख्यप्रसादाय नमः॥ ॐ दुर्वाससे नमः॥ ॐ सर्वसाधुनिषेविताय नमः॥ ॐ प्रस्कन्दनाय नमः॥ ॐ विभागज्ञाय नमः॥ ॐ अतुल्याय नमः॥ ॐ यज्ञविभागविदे नमः॥ ॐ सर्वचारिणे नमः॥ ॐ सर्ववासाय नमः॥ ॐ दुर्वाससे नमः॥ ॐ वासवाय नमः॥ ॐ अमराय नमः॥ ॐ हैमाय नमः॥ ॐ हेमकराय नमः॥ ॐ अयज्ञसर्वधारिणे नमः॥ ॐ धरोत्तमाय नमः॥ ॐ लोहिताक्षाय नमः॥ ॐ महाक्षाय नमः॥ ॐ विजयाक्षाय नमः॥ ॐ विशारदाय नमः॥ ॐ संग्रहाय नमः॥ ॐ निग्रहाय नमः॥ ॐ कर्त्रे नमः॥ ॐ सर्पचीरनिवसनाय नमः॥ ॐ मुख्याय नमः॥ ॐ अमुख्याय नमः॥ ॐ देहाय नमः॥ ॐ काहलये नमः॥ ॐ सर्वकामदाय नमः॥ ॐ सर्वकालप्रसादाय नमः॥ ॐ सुबलाय नमः॥ ॐ बलरूपधृगे नमः॥ ॐ सर्वकामवराय नमः॥ ॐ सर्वदाय नमः॥ ॐ सर्वतोमुखाय नमः॥ ॐ आकाशनिर्विरूपाय नमः॥ ॐ निपातिने नमः॥ ॐ अवशाय नमः॥ ॐ खगाय नमः॥ 
ॐ रौद्ररूपाय नमः॥ ॐ अंशवे नमः॥ ॐ आदित्याय नमः॥ ॐ बहुरश्मये नमः॥ ॐ सुवर्चसिने नमः॥ ॐ वसुवेगाय नमः॥ ॐ महावेगाय नमः॥ ॐ मनोवेगाय नमः॥ ॐ निशाचराय नमः॥ ॐ सर्ववासिने नमः॥ ॐ श्रियावासिने नमः॥ ॐ उपदेशकराय नमः॥ ॐ अकराय नमः॥ ॐ मुनये नमः॥ ॐ आत्मनिरालोकाय नमः॥ ॐ संभग्नाय नमः॥ ॐ सहस्रदाय नमः॥ ॐ पक्षिणे नमः॥ ॐ पक्षरूपाय नमः॥ ॐ अतिदीप्ताय नमः॥ ॐ विशाम्पतये नमः॥ ॐ उन्मादाय नमः॥ ॐ मदनाय नमः॥ ॐ कामाय नमः॥ ॐ अश्वत्थाय नमः॥ ॐ अर्थकराय नमः॥ ॐ यशसे नमः॥ ॐ वामदेवाय नमः॥ ॐ वामाय नमः॥ ॐ प्राचे नमः॥ ॐ दक्षिणाय नमः॥ ॐ वामनाय नमः॥ ॐ सिद्धयोगिने नमः॥ ॐ महर्षये नमः॥ ॐ सिद्धार्थाय नमः॥ ॐ सिद्धसाधकाय नमः॥ ॐ भिक्षवे नमः॥ ॐ भिक्षुरूपाय नमः॥ ॐ विपणाय नमः॥ ॐ मृदवे नमः॥ ॐ अव्ययाय नमः॥ ॐ महासेनाय नमः॥ ॐ विशाखाय नमः॥ 
ॐ षष्टिभागाय नमः॥ ॐ गवाम्पतये नमः॥ ॐ वज्रहस्ताय नमः॥ ॐ विष्कम्भिने नमः॥ ॐ चमुस्तंभनाय नमः॥ ॐ वृत्तावृत्तकराय नमः॥ ॐ तालाय नमः॥ ॐ मधवे नमः॥ ॐ मधुकलोचनाय नमः॥ ॐ वाचस्पतये नमः॥ ॐ वाजसनाय नमः॥ ॐ नित्यमाश्रमपूजिताय नमः॥ ॐ ब्रह्मचारिणे नमः॥ ॐ लोकचारिणे नमः॥ ॐ सर्वचारिणे नमः॥ ॐ विचारविदे नमः॥ ॐ ईशानाय नमः॥ ॐ ईश्वराय नमः॥ ॐ कालाय नमः॥ ॐ निशाचारिणे नमः॥ ॐ पिनाकधृगे नमः॥ ॐ निमितस्थाय नमः॥ ॐ निमित्ताय नमः॥ ॐ नन्दये नमः॥ ॐ नन्दिकराय नमः॥ ॐ हरये नमः॥ ॐ नन्दीश्वराय नमः॥ ॐ नन्दिने नमः॥ ॐ नन्दनाय नमः॥ ॐ नंन्दीवर्धनाय नमः॥ ॐ भगहारिणे नमः॥ ॐ निहन्त्रे नमः॥ ॐ कालाय नमः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः॥ ॐ पितामहाय नमः॥ ॐ चतुर्मुखाय नमः॥ ॐ महालिंगाय नमः॥ ॐ चारूलिंगाय नमः॥ ॐ लिंगाध्यक्षाय नमः॥ ॐ सुराध्यक्षाय नमः॥ ॐ योगाध्यक्षाय नमः॥ ॐ युगावहाय नमः॥ ॐ बीजाध्यक्षाय नमः॥ ॐ बीजकर्त्रे नमः॥ ॐ अध्यात्मानुगताय नमः॥ ॐ बलाय नमः॥ ॐ इतिहासाय नमः॥ ॐ सकल्पाय नमः॥ ॐ गौतमाय नमः॥ ॐ निशाकराय नमः॥    
ॐ दम्भाय नमः॥ ॐ अदम्भाय नमः॥ ॐ वैदम्भाय नमः॥ ॐ वश्याय नमः॥ ॐ वशकराय नमः॥ ॐ कलये नमः॥ ॐ लोककर्त्रे नमः॥ ॐ पशुपतये नमः॥ ॐ महाकर्त्रे नमः॥ ॐ अनौषधाय नमः॥ ॐ अक्षराय नमः॥ ॐ परब्रह्मणे नमः॥ ॐ बलवते नमः॥ ॐ शक्राय नमः॥ ॐ नीतये नमः॥ ॐ अनीतये नमः॥ ॐ शुद्धात्मने नमः॥ ॐ मान्याय नमः॥ ॐ शुद्धाय नमः॥ ॐ गतागताय नमः॥ ॐ बहुप्रसादाय नमः॥ ॐ सुस्पप्नाय नमः॥ ॐ दर्पणाय नमः॥ ॐ अमित्रजिते नमः॥ ॐ वेदकराय नमः॥ ॐ मंत्रकराय नमः॥ ॐ विदुषे नमः॥ ॐ समरमर्दनाय नमः॥ ॐ महामेघनिवासिने नमः॥ ॐ महाघोराय नमः॥ ॐ वशिने नमः॥ ॐ कराय नमः॥ ॐ अग्निज्वालाय नमः॥ ॐ महाज्वालाय नमः॥ ॐ अतिधूम्राय नमः॥ ॐ हुताय नमः॥ ॐ हविषे नमः॥ ॐ वृषणाय नमः॥ ॐ शंकराय नमः॥ ॐ नित्यंवर्चस्विने नमः॥ ॐ धूमकेताय नमः॥ ॐ नीलाय नमः॥ ॐ अंगलुब्धाय नमः॥ ॐ शोभनाय नमः॥ ॐ निरवग्रहाय नमः॥ ॐ स्वस्तिदायकाय नमः॥ ॐ स्वस्तिभावाय नमः॥ ॐ भागिने नमः॥ ॐ भागकराय नमः॥ ॐ लघवे नमः॥ 
ॐ उत्संगाय नमः॥ ॐ महांगाय नमः॥ ॐ महागर्भपरायणाय नमः॥ ॐ कृष्णवर्णाय नमः॥ ॐ सुवर्णाय नमः॥ ॐ सर्वदेहिनामिनिन्द्राय नमः॥ ॐ महापादाय नमः॥ ॐ महाहस्ताय नमः॥ ॐ महाकायाय नमः॥ ॐ महायशसे नमः॥ ॐ महामूर्धने नमः॥ ॐ महामात्राय नमः॥ ॐ महानेत्राय नमः॥ ॐ निशालयाय नमः॥ ॐ महान्तकाय नमः॥ ॐ महाकर्णाय नमः॥ ॐ महोष्ठाय नमः॥ ॐ महाहनवे नमः॥ ॐ महानासाय नमः॥ ॐ महाकम्बवे नमः॥ ॐ महाग्रीवाय नमः॥ ॐ श्मशानभाजे नमः॥ ॐ महावक्षसे नमः॥ ॐ महोरस्काय नमः॥ ॐ अंतरात्मने नमः॥ ॐ मृगालयाय नमः॥ ॐ लंबनाय नमः॥ ॐ लम्बितोष्ठाय नमः॥ ॐ महामायाय नमः॥ ॐ पयोनिधये नमः॥ ॐ महादन्ताय नमः॥ ॐ महाद्रष्टाय नमः॥ ॐ महाजिह्वाय नमः॥ ॐ महामुखाय नमः॥ ॐ महारोम्णे नमः॥ ॐ महाकोशाय नमः॥ ॐ महाजटाय नमः॥ ॐ प्रसन्नाय नमः॥ ॐ प्रसादाय नमः॥ ॐ प्रत्ययाय नमः॥ ॐ गिरिसाधनाय नमः॥ ॐ स्नेहनाय नमः॥ ॐ अस्नेहनाय नमः॥ ॐ अजिताय नमः॥ ॐ महामुनये नमः॥ ॐ वृक्षाकाराय नमः॥ ॐ वृक्षकेतवे नमः॥ ॐ अनलाय नमः॥ ॐ वायुवाहनाय नमः॥
ॐ गण्डलिने नमः॥
ॐ मेरूधाम्ने नमः॥
ॐ देवाधिपतये नमः॥
ॐ अथर्वशीर्षाय नमः॥
ॐ सामास्या नमः॥
ॐ ऋक्सहस्रामितेक्षणाय नमः॥
ॐ यजुः॥ पादभुजाय नमः॥
ॐ गुह्याय नमः॥
ॐ प्रकाशाय नमः॥
ॐ जंगमाय नमः॥
ॐ अमोघार्थाय नमः॥
ॐ प्रसादाय नमः॥
ॐ अभिगम्याय नमः॥
ॐ सुदर्शनाय नमः॥
ॐ उपकाराय नमः॥
ॐ प्रियाय नमः॥
ॐ सर्वाय नमः॥
ॐ कनकाय नमः॥
ॐ काञ्चनवच्छये नमः॥
ॐ नाभये नमः॥
ॐ नन्दिकराय नमः॥
ॐ भावाय नमः॥
ॐ पुष्करथपतये नमः॥
ॐ स्थिराय नमः॥
ॐ द्वादशाय नमः॥
ॐ त्रासनाय नमः॥
ॐ आद्याय नमः॥
ॐ यज्ञाय नमः॥
ॐ यज्ञसमाहिताय नमः॥
ॐ नक्तंस्वरूपाय नमः॥
ॐ कलये नमः॥
ॐ कालाय नमः॥
ॐ मकराय नमः॥
ॐ कालपूजिताय नमः॥
ॐ सगणाय नमः॥
ॐ गणकराय नमः॥
ॐ भूतवाहनसारथये नमः॥
ॐ भस्मशयाय नमः॥
ॐ भस्मगोप्त्रे नमः॥
ॐ भस्मभूताय नमः॥
ॐ तरवे नमः॥
ॐ गणाय नमः॥
ॐ लोकपालाय नमः॥
ॐ आलोकाय नमः॥
ॐ महात्मने नमः॥
ॐ सर्वपूजिताय नमः॥
ॐ शुक्लाय नमः॥
ॐ त्रिशुक्लाय नमः॥
ॐ संपन्नाय नमः॥
ॐ शुचये नमः॥ (550) 
ॐ भूतनिशेविताय नमः॥
ॐ आश्रमस्थाय नमः॥
ॐ क्रियावस्थाय नमः॥
ॐ विश्वकर्ममतये नमः॥
ॐ वराय नमः॥
ॐ विशालशाखाय नमः॥
ॐ ताम्रोष्ठाय नमः॥
ॐ अम्बुजालाय नमः॥
ॐ सुनिश्चलाय नमः॥
ॐ कपिलाय नमः॥
ॐ कपिशाय नमः॥
ॐ शुक्लाय नमः॥
ॐ आयुषे नमः॥
ॐ पराय नमः॥
ॐ अपराय नमः॥
ॐ गंधर्वाय नमः॥
ॐ अदितये नमः॥
ॐ ताक्ष्याय नमः॥
ॐ सुविज्ञेयाय नमः॥
ॐ सुशारदाय नमः॥
ॐ परश्वधायुधाय नमः॥
ॐ देवाय नमः॥
ॐ अनुकारिणे नमः॥
ॐ सुबान्धवाय नमः॥
ॐ तुम्बवीणाय नमः॥
ॐ महाक्रोधाय नमः॥
ॐ ऊर्ध्वरेतसे नमः॥
ॐ जलेशयाय नमः॥
ॐ उग्राय नमः॥
ॐ वंशकराय नमः॥
ॐ वंशाय नमः॥
ॐ वंशानादाय नमः॥
ॐ अनिन्दिताय नमः॥
ॐ सर्वांगरूपाय नमः॥
ॐ मायाविने नमः॥
ॐ सुहृदे नमः॥
ॐ अनिलाय नमः॥
ॐ अनलाय नमः॥
ॐ बन्धनाय नमः॥
ॐ बन्धकर्त्रे नमः॥
ॐ सुवन्धनविमोचनाय नमः॥
ॐ सयज्ञयारये नमः॥
ॐ सकामारये नमः॥
ॐ महाद्रष्टाय नमः॥
ॐ महायुधाय नमः॥
ॐ बहुधानिन्दिताय नमः॥
ॐ शर्वाय नमः॥
ॐ शंकराय नमः॥
ॐ शं कराय नमः॥
ॐ अधनाय नमः॥ 
ॐ अमरेशाय नमः॥
ॐ महादेवाय नमः॥
ॐ विश्वदेवाय नमः॥
ॐ सुरारिघ्ने नमः॥
ॐ अहिर्बुद्धिन्याय नमः॥
  ॐ अनिलाभाय नमः॥
ॐ चेकितानाय नमः॥
ॐ हविषे नमः॥
ॐ अजैकपादे नमः॥
ॐ कापालिने नमः॥
ॐ त्रिशंकवे नमः॥
ॐ अजिताय नमः॥
ॐ शिवाय नमः॥
ॐ धन्वन्तरये नमः॥
ॐ धूमकेतवे नमः॥
ॐ स्कन्दाय नमः॥
ॐ वैश्रवणाय नमः॥
ॐ धात्रे नमः॥
ॐ शक्राय नमः॥
ॐ विष्णवे नमः॥
ॐ मित्राय नमः॥
ॐ त्वष्ट्रे नमः॥
ॐ ध्रुवाय नमः॥
ॐ धराय नमः॥
ॐ प्रभावाय नमः॥
ॐ सर्वगोवायवे नमः॥
ॐ अर्यम्णे नमः॥
ॐ सवित्रे नमः॥
ॐ रवये नमः॥
ॐ उषंगवे नमः॥
ॐ विधात्रे नमः॥
ॐ मानधात्रे नमः॥
ॐ भूतवाहनाय नमः॥
ॐ विभवे नमः॥
ॐ वर्णविभाविने नमः॥
ॐ सर्वकामगुणवाहनाय नमः॥
ॐ पद्मनाभाय नमः॥
ॐ महागर्भाय नमः॥
चन्द्रवक्त्राय नमः॥
ॐ अनिलाय नमः॥
ॐ अनलाय नमः॥
ॐ बलवते नमः॥
ॐ उपशान्ताय नमः॥
ॐ पुराणाय नमः॥
ॐ पुण्यचञ्चवे नमः॥
ॐ ईरूपाय नमः॥
ॐ कुरूकर्त्रे नमः॥
ॐ कुरूवासिने नमः॥
ॐ कुरूभूताय नमः॥
ॐ गुणौषधाय नमः॥
ॐ सर्वाशयाय नमः॥
ॐ दर्भचारिणे नमः॥
ॐ सर्वप्राणिपतये नमः॥
ॐ देवदेवाय नमः॥
ॐ सुखासक्ताय नमः॥
ॐ सत स्वरूपाय नमः॥
ॐ असत् रूपाय नमः॥
ॐ सर्वरत्नविदे नमः॥
ॐ कैलाशगिरिवासने नमः॥
ॐ हिमवद्गिरिसंश्रयाय नमः॥
ॐ कूलहारिणे नमः॥
ॐ कुलकर्त्रे नमः॥
ॐ बहुविद्याय नमः॥
ॐ बहुप्रदाय नमः॥
ॐ वणिजाय नमः॥
ॐ वर्धकिने नमः॥
ॐ वृक्षाय नमः॥
ॐ बकुलाय नमः॥
ॐ चंदनाय नमः॥
ॐ छदाय नमः॥
ॐ सारग्रीवाय नमः॥
ॐ महाजत्रवे नमः॥
ॐ अलोलाय नमः॥
ॐ महौषधाय नमः॥
ॐ सिद्धार्थकारिणे नमः॥
ॐ छन्दोव्याकरणोत्तर-सिद्धार्थाय नमः॥
ॐ सिंहनादाय नमः॥
ॐ सिंहद्रंष्टाय नमः॥
ॐ सिंहगाय नमः॥
ॐ सिंहवाहनाय नमः॥
ॐ प्रभावात्मने नमः॥
ॐ जगतकालस्थालाय नमः॥
ॐ लोकहिताय नमः॥
ॐ तरवे नमः॥
ॐ सारंगाय नमः॥
ॐ नवचक्रांगाय नमः॥
ॐ केतुमालिने नमः॥
ॐ सभावनाय नमः॥
ॐ भूतालयाय नमः॥
ॐ भूतपतये नमः॥
ॐ अहोरात्राय नमः॥
ॐ अनिन्दिताय नमः॥
ॐ सर्वभूतवाहित्रे नमः॥
ॐ सर्वभूतनिलयाय नमः॥
ॐ विभवे नमः॥
ॐ भवाय नमः॥
ॐ अमोघाय नमः॥
ॐ संयताय नमः॥
ॐ अश्वाय नमः॥
ॐ भोजनाय नमः॥
ॐ प्राणधारणाय नमः॥
ॐ धृतिमते नमः॥
ॐ मतिमते नमः॥
ॐ दक्षाय नमः॥
ॐ सत्कृयाय नमः॥
ॐ युगाधिपाय नमः॥
ॐ गोपाल्यै नमः॥
ॐ गोपतये नमः॥
ॐ ग्रामाय नमः॥
ॐ गोचर्मवसनाय नमः॥
ॐ हरये नमः॥
ॐ हिरण्यबाहवे नमः॥
ॐ प्रवेशिनांगुहापालाय नमः॥
ॐ प्रकृष्टारये नमः॥
ॐ महाहर्षाय नमः॥
ॐ जितकामाय नमः॥
ॐ जितेन्द्रियाय नमः॥
ॐ गांधाराय नमः॥
ॐ सुवासाय नमः॥
ॐ तपः॥सक्ताय नमः॥
ॐ रतये नमः॥
ॐ नराय नमः॥
ॐ महागीताय नमः॥
ॐ महानृत्याय नमः॥
ॐ अप्सरोगणसेविताय नमः॥
ॐ महाकेतवे नमः॥
ॐ महाधातवे नमः॥
ॐ नैकसानुचराय नमः॥
ॐ चलाय नमः॥
ॐ आवेदनीयाय नमः॥
ॐ आदेशाय नमः॥
ॐ सर्वगंधसुखावहाय नमः॥
ॐ तोरणाय नमः॥
ॐ तारणाय नमः॥
ॐ वाताय नमः॥
ॐ परिधये नमः॥
ॐ पतिखेचराय नमः॥
ॐ संयोगवर्धनाय नमः॥
ॐ वृद्धाय नमः॥
ॐ गुणाधिकाय नमः॥
ॐ अतिवृद्धाय नमः॥
ॐ नित्यात्मसहायाय नमः॥
ॐ देवासुरपतये नमः॥
ॐ पत्ये नमः॥
ॐ युक्ताय नमः॥
ॐ युक्तबाहवे नमः॥
ॐ दिविसुपर्वदेवाय नमः॥
ॐ आषाढाय नमः॥
ॐ सुषाढ़ाय नमः॥
ॐ ध्रुवाय नमः॥
ॐ हरिणाय नमः॥
ॐ हराय नमः॥
ॐ आवर्तमानवपुषे नमः॥
ॐ वसुश्रेष्ठाय नमः॥
ॐ महापथाय नमः॥
ॐ विमर्षशिरोहारिणे नमः॥
ॐ सर्वलक्षणलक्षिताय नमः॥
ॐ अक्षरथयोगिने नमः॥
ॐ सर्वयोगिने नमः॥
ॐ महाबलाय नमः॥
ॐ समाम्नायाय नमः॥
ॐ असाम्नायाय नमः॥
ॐ तीर्थदेवाय नमः॥
ॐ महारथाय नमः॥
ॐ निर्जीवाय नमः॥
ॐ जीवनाय नमः॥
ॐ मंत्राय नमः॥
ॐ शुभाक्षाय नमः॥
ॐ बहुकर्कशाय नमः॥
ॐ रत्नप्रभूताय नमः॥
ॐ रत्नांगाय नमः॥
ॐ महार्णवनिपानविदे नमः॥
ॐ मूलाय नमः॥
ॐ विशालाय नमः॥
ॐ अमृताय नमः॥
ॐ व्यक्ताव्यवक्ताय नमः॥
ॐ तपोनिधये नमः॥
ॐ आरोहणाय नमः॥
ॐ अधिरोहाय नमः॥
ॐ शीलधारिणे नमः॥
ॐ महायशसे नमः॥
ॐ सेनाकल्पाय नमः॥
ॐ महाकल्पाय नमः॥
ॐ योगाय नमः॥
ॐ युगकराय नमः॥
ॐ हरये नमः॥
ॐ युगरूपाय नमः॥
ॐ महारूपाय नमः॥
ॐ महानागहतकाय नमः॥
ॐ अवधाय नमः॥
ॐ न्यायनिर्वपणाय नमः॥
ॐ पादाय नमः॥
ॐ पण्डिताय नमः॥
ॐ अचलोपमाय नमः॥
ॐ बहुमालाय नमः॥
ॐ महामालाय नमः॥
ॐ शशिहरसुलोचनाय नमः॥
ॐ विस्तारलवणकूपाय नमः॥
ॐ त्रिगुणाय नमः॥
ॐ सफलोदयाय नमः॥
ॐ त्रिलोचनाय नमः॥
ॐ विषण्डागाय नमः॥
ॐ मणिविद्धाय नमः॥
ॐ जटाधराय नमः॥
ॐ बिन्दवे नमः॥
ॐ विसर्गाय नमः॥
ॐ सुमुखाय नमः॥
ॐ शराय नमः॥
ॐ सर्वायुधाय नमः॥
ॐ सहाय नमः॥
 ॐ सहाय नमः॥
ॐ निवेदनाय नमः॥
ॐ सुखाजाताय नमः॥
ॐ सुगन्धराय नमः॥
ॐ महाधनुषे नमः॥
ॐ गंधपालिभगवते नमः॥
ॐ सर्वकर्मोत्थानाय नमः॥
ॐ मन्थानबहुलवायवे नमः॥
ॐ सकलाय नमः॥
ॐ सर्वलोचनाय नमः॥
ॐ तलस्तालाय नमः॥
ॐ करस्थालिने नमः॥
ॐ ऊर्ध्वसंहननाय नमः॥
ॐ महते नमः॥
ॐ छात्राय नमः॥
ॐ सुच्छत्राय नमः॥
ॐ विख्यातलोकाय नमः॥
ॐ सर्वाश्रयक्रमाय नमः॥
ॐ मुण्डाय नमः॥
ॐ विरूपाय नमः॥
ॐ विकृताय नमः॥
ॐ दण्डिने नमः॥
ॐ कुदण्डिने नमः॥
ॐ विकुर्वणाय नमः॥
ॐ हर्यक्षाय नमः॥
ॐ ककुभाय नमः॥
ॐ वज्रिणे नमः॥
ॐ शतजिह्वाय नमः॥
ॐ सहस्रपदे नमः॥
ॐ देवेन्द्राय नमः॥
ॐ सर्वदेवमयाय नमः॥
ॐ गुरवे नमः॥
ॐ सहस्रबाहवे नमः॥
ॐ सर्वांगाय नमः॥
ॐ शरण्याय नमः॥
ॐ सर्वलोककृते नमः॥
ॐ पवित्राय नमः॥
ॐ त्रिककुन्मंत्राय नमः॥
ॐ कनिष्ठाय नमः॥
ॐ कृष्णपिंगलाय नमः॥
ॐ ब्रह्मदण्डविनिर्मात्रे नमः॥
ॐ शतघ्नीपाशशक्तिमते नमः॥
ॐ पद्मगर्भाय नमः॥
ॐ महागर्भाय नमः॥
ॐ ब्रह्मगर्भाय नमः॥
ॐ जलोद्भावाय नमः॥
ॐ गभस्तये नमः॥
ॐ ब्रह्मकृते नमः॥
ॐ ब्रह्मिणे नमः॥
ॐ ब्रह्मविदे नमः॥
ॐ ब्राह्मणाय नमः॥
ॐ गतये नमः॥
ॐ अनंतरूपाय नमः॥
ॐ नैकात्मने नमः॥
ॐ स्वयंभुवतिग्मतेजसे नमः॥
ॐ उर्ध्वगात्मने नमः॥
ॐ पशुपतये नमः॥
ॐ वातरंहसे नमः॥
ॐ मनोजवाय नमः॥
ॐ चंदनिने नमः॥
ॐ पद्मनालाग्राय नमः॥
ॐ सुरभ्युत्तारणाय नमः॥
ॐ नराय नमः॥
ॐ कर्णिकारमहास्रग्विणमे नमः॥
ॐ नीलमौलये नमः॥
ॐ पिनाकधृषे नमः॥
ॐ उमापतये नमः॥
ॐ उमाकान्ताय नमः॥
ॐ जाह्नवीधृषे नमः॥
ॐ उमादवाय नमः॥
ॐ वरवराहाय नमः॥
ॐ वरदाय नमः॥
ॐ वरेण्याय नमः॥
ॐ सुमहास्वनाय नमः॥
ॐ महाप्रसादाय नमः॥
ॐ दमनाय नमः॥
ॐ शत्रुघ्ने नमः॥
ॐ श्वेतपिंगलाय नमः॥
ॐ पीतात्मने नमः॥
ॐ परमात्मने नमः॥
ॐ प्रयतात्मने नमः॥
ॐ प्रधानधृषे नमः॥
ॐ सर्वपार्श्वमुखाय नमः॥
ॐ त्रक्षाय नमः॥
ॐ धर्मसाधारणवराय नमः॥
ॐ चराचरात्मने नमः॥
ॐ सूक्ष्मात्मने नमः॥
ॐ अमृतगोवृषेश्वराय नमः॥
ॐ साध्यर्षये नमः॥
ॐ आदित्यवसवे नमः॥ 
ॐ विवस्वत्सवित्रमृताय नमः॥
ॐ व्यासाय नमः॥
ॐ सर्गसुसंक्षेपविस्तराय नमः॥
ॐ पर्ययोनराय नमः॥
ॐ ऋतवे नमः॥
ॐ संवत्सराय नमः॥
ॐ मासाय नमः॥
ॐ पक्षाय नमः॥
ॐ संख्यासमापनाय नमः॥
ॐ कलायै नमः॥
ॐ काष्ठायै नमः॥
ॐ लवेभ्यो नमः॥
ॐ मात्रेभ्यो नमः॥
ॐ मुहूर्ताहः॥क्षपाभ्यो नमः॥
ॐ क्षणेभ्यो नमः॥
ॐ विश्वक्षेत्राय नमः॥
ॐ प्रजाबीजाय नमः॥
ॐ लिंगाय नमः॥
ॐ आद्यनिर्गमाय नमः॥
ॐ सत् स्वरूपाय नमः॥
ॐ असत् रूपाय नमः॥
ॐ व्यक्ताय नमः॥
ॐ अव्यक्ताय नमः॥
ॐ पित्रे नमः॥
ॐ मात्रे नमः॥
ॐ पितामहाय नमः॥
ॐ स्वर्गद्वाराय नमः॥
ॐ प्रजाद्वाराय नमः॥
ॐ मोक्षद्वाराय नमः॥
ॐ त्रिविष्टपाय नमः॥
ॐ निर्वाणाय नमः॥
ॐ ह्लादनाय नमः॥
ॐ ब्रह्मलोकाय नमः॥
ॐ परागतये नमः॥
ॐ देवासुरविनिर्मात्रे नमः॥
ॐ देवासुरपरायणाय नमः॥
ॐ देवासुरगुरूवे नमः॥
ॐ देवाय नमः॥
ॐ देवासुरनमस्कृताय नमः॥
ॐ देवासुरमहामात्राय नमः॥
ॐ देवासुरमहामात्राय नमः॥
ॐ देवासुरगणाश्रयाय नमः॥
ॐ देवासुरगणाध्यक्षाय नमः॥
ॐ देवासुरगणाग्रण्ये नमः॥
ॐ देवातिदेवाय नमः॥
ॐ देवर्षये नमः॥
ॐ देवासुरवरप्रदाय नमः॥
ॐ विश्वाय नमः॥
ॐ देवासुरमहेश्वराय नमः॥
ॐ सर्वदेवमयाय नमः॥
ॐ अचिंत्याय नमः॥
ॐ देवात्मने नमः॥
ॐ आत्मसंबवाय नमः॥
ॐ उद्भिदे नमः॥
ॐ त्रिविक्रमाय नमः॥
ॐ वैद्याय नमः॥
ॐ विरजाय नमः॥
ॐ नीरजाय नमः॥
ॐ अमराय नमः॥
ॐ इड्याय नमः॥
ॐ हस्तीश्वराय नमः॥
ॐ व्याघ्राय नमः॥
ॐ देवसिंहाय नमः॥
ॐ नरर्षभाय नमः॥
ॐ विभुदाय नमः॥
ॐ अग्रवराय नमः॥
ॐ सूक्ष्माय नमः॥
ॐ सर्वदेवाय नमः॥
ॐ तपोमयाय नमः॥
ॐ सुयुक्ताय नमः॥
ॐ शोभनाय नमः॥
ॐ वज्रिणे नमः॥
ॐ प्रासानाम्प्रभवाय नमः॥
ॐ अव्ययाय नमः॥
ॐ गुहाय नमः॥
ॐ कान्ताय नमः॥
ॐ निजसर्गाय नमः॥
ॐ पवित्राय नमः॥
ॐ सर्वपावनाय नमः॥
ॐ श्रृंगिणे नमः॥
ॐ श्रृंगप्रियाय नमः॥
ॐ बभ्रवे नमः॥
ॐ राजराजाय नमः॥
ॐ निरामयाय नमः॥
ॐ अभिरामाय नमः॥
ॐ सुरगणाय नमः॥
ॐ विरामाय नमः॥
ॐ सर्वसाधनाय नमः॥
ॐ ललाटाक्षाय नमः॥
ॐ विश्वदेवाय नमः॥
ॐ हरिणाय नमः॥
ॐ ब्रह्मवर्चसे नमः॥
ॐ स्थावरपतये नमः॥
ॐ नियमेन्द्रियवर्धनाय नमः॥
ॐ सिद्धार्थाय नमः॥
ॐ सिद्धभूतार्थाय नमः॥
ॐ अचिन्ताय नमः॥
ॐ सत्यव्रताय नमः॥
ॐ शुचये नमः॥
ॐ व्रताधिपाय नमः॥
ॐ पराय नमः॥
ॐ ब्रह्मणे नमः॥
ॐ भक्तानांपरमागतये नमः॥
ॐ विमुक्ताय नमः॥
ॐ मुक्ततेजसे नमः॥
ॐ श्रीमते नमः॥
ॐ श्रीवर्धनाय नमः॥
ॐ श्री जगते नमः॥

ॐ पूर्णमदः॥ पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शांतिः॥ शांतिः॥ शांतिः॥

श्रीरुद्राष्टकम्
(भगवान शिव) 
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे5हं॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो5हं॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।

त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे5हं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो5हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।

जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥

अर्थ :- हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात मायादिरहित), [मायिक] गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप में धारण करने वाले दिगम्बर [अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले] आपको मैं भजता हूँ॥1॥ निराकार, ओङ्कार के मूल, तुरीय (तीनों गणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥ जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोडों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर नदी गङ्गाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर बाल चन्द्रमा (द्वितीया का चन्द्रमा) और गले में सर्प सुशोभित हैं॥3॥ जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करने वाले] श्रीशङ्करजी को मैं भजता हूँ॥4॥ प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्यो के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्रीशङ्करजी को मैं भजता हूँ॥5॥ कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये॥6॥ जबतक, पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले प्रभो! प्रसन्न होइये॥7॥ मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढापा तथा जन्म (मृत्यु) के दु:खसमूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दु:ख से रक्षा कीजिये। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥8॥ भगवान रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शङ्करजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढते हैं, उन पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं॥9॥

भगवान शिव की आरती
भगवान शिव
शीश गंग अर्धग पार्वती सदा विराजत कैलासी।
नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुखरासी॥

शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह बैठे हैं शिव अविनाशी।
करत गान-गन्धर्व सप्त स्वर राग रागिनी मधुरासी॥

यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत, बोलत हैं वनके वासी।
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत हैं गुंजा-सी॥

कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु लाग रहे हैं लक्षासी।
कामधेनु कोटिन जहँ डोलत करत दुग्ध की वर्षा-सी॥

सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्त सम हिमराशी।
नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित सेवत सदा प्रकृति दासी॥

ऋषि मुनि देव दनुज नित सेवत, गान करत श्रुति गुणराशी।
ब्रह्मा, विष्णु निहारत निसिदिन कछु शिव हमकू फरमासी॥

ऋद्धि सिद्ध के दाता शंकर नित सत् चित् आनन्दराशी।
जिनके सुमिरत ही कट जाती कठिन काल यमकी फांसी॥

त्रिशूलधरजी का नाम निरन्तर प्रेम सहित जो नरगासी।
दूर होय विपदा उस नर की जन्म-जन्म शिवपद पासी॥

कैलाशी काशी के वासी अविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान कृपा कीजो॥

तुम तो प्रभुजी सदा दयामय अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकर किंकर की विनती सुनियो॥


हर हर हर महादेव।
आरती, भोलेनाथ, महादेव, हर-हर

सत्य, सनातन, सुन्दर शिव! सबके स्वामी।
अविकारी, अविनाशी, अज, अन्तर्यामी॥ हर हर .

आदि, अनन्त, अनामय, अकल कलाधारी।
अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥ हर हर..

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी।
कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी॥ हरहर ..

रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औघरदानी।
साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता, अभिमानी॥ हरहर ..

मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी।
सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥ हरहर ..

छाल कपाल, गरल गल, मुण्डमाल, व्याली।
चिताभस्मतन, त्रिनयन, अयनमहाकाली॥ हरहर ..

प्रेत पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी।
विवसन विकट रूपधर रुद्र प्रलयकारी॥ हरहर ..

शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।
अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मनहारी॥ हरहर ..

निर्गुण, सगुण, निर†जन, जगमय, नित्य प्रभो।
कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥ हरहर ..

सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता।
प्रेम सुधा निधि, प्रियतम, अखिल विश्व त्राता। हरहर ..

हम अतिदीन, दयामय! चरण शरण दीजै।
सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै। हरहर ..

महादेव की आरती
शिव
जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव अद्र्धागी धारा॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

एकानन, चतुरानन, पंचानन राजै।
हंसासन, गरुडासन, वृषवाहन साजै॥ ॐ हर हर ..

दो भुज चारु चतुर्भुज, दशभुज ते सोहे।
तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन-जन मोहे॥ ॐ हर हर ..

अक्षमाला, वनमाला, रुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी, कंसारी, करमाला धारी॥ ॐ हर हर ..

श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे।
सनकादिक, गरुडादिक, भूतादिक संगे॥ ॐ हर हर ..

कर मध्ये सुकमण्डलु, चक्र शूलधारी।
सुखकारी, दुखहारी, जग पालनकारी॥ ॐ हर हर ..

ब्रह्माविष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। ॐ हर हर ..

त्रिगुणस्वामिकी आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवान्छित फल पावै॥ ॐ हर हर ..

Thursday, April 12, 2012

शिव


शिव
जय गणेश गिरिजासुवन मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम देउ अभय वरदान॥




 ग्यारह रूद्र
वेदों का ज्ञान कुदरत के कण-कण में शिव के अनेक रूपों का दर्शन कराता है। इन रूपों में ही एक हैं - रुद्र। रुद्र का शाब्दिक अर्थ होता है - रुत यानी दु:खों को अंत करने वाला। यही कारण है कि शिव को दु:खों का नाश करने वाले देवता के रुप में पूजा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक शिव ग्यारह अलग-अलग रुद्र रूपों में दु:खों का नाश करते हैं। यह ग्यारह रूप एकादश रुद्र के नाम से जाने जाते हैं।


व्यावहारिक जीवन में भी कोई दु:खों को तभी भोगता है, जब तन, मन या कर्म किसी न किसी रूप में अपवित्र होते हैं। इसी कारण धर्म और आध्यात्म के धरातल पर दस इन्द्रियों और मन को मिलाकर ग्यारह यानी एकादश रुद्र माने गए है। जिनमें शुभ भाव और ऊर्जा का होना ही शिवत्व को पाने के समान है। शिव के रुद्र रूप की आराधना का महत्व यही है कि इससे व्यक्ति का चित्त पवित्र रहता है और वह ऐसे कर्म और विचारों से दूर होता है, जो मन में बुरे भाव पैदा करे। जानते हैं ऐसे ही ग्यारह रूद्र रूपों को– 


शम्भू - शास्त्रों के मुताबिक यह रुद्र रूप साक्षात ब्रह्म है। इस रूप में ही वह जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।


पिनाकी - ज्ञान शक्ति रूपी चारों वेदों के स्वरूप माने जाने वाले पिनाकी रुद्र दु:खों का अंत करते हैं।


गिरीश - कैलाशवासी होने से रुद्र का तीसरा रुप गिरीश कहलाता है। इस रुप में रुद्र सुख और आनंद देने वाले माने गए हैं।


स्थाणु - समाधि, तप और आत्मलीन होने से रुद्र का चौथा अवतार स्थाणु कहलाता है। इस रुप में पार्वती रूप शक्ति बाएं भाग में विराजित होती है।


भर्ग - भगवान रुद्र का यह रुप बहुत तेजोमयी है। इस रुप में रुद्र हर भय और पीड़ा का नाश करने वाले होते हैं।


भव - रुद्र का भव रुप ज्ञान बल, योग बल और भगवत प्रेम के रुप में सुख देने वाला माना जाता है।


सदाशिव - रुद्र का यह स्वरुप निराकार ब्रह्म का साकार रूप माना जाता है। जो सभी वैभव, सुख और आनंद देने वाला माना जाता है।


शिव - यह रुद्र रूप अंतहीन सुख देने वाला यानी कल्याण करने वाला माना जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव आराधना महत्वपूर्ण मानी जाती है।


हर - इस रुप में नाग धारण करने वाले रुद्र शारीरिक, मानसिक और सांसारिक दु:खों को हर लेते हैं। नाग रूपी काल पर इन का नियंत्रण होता है।


शर्व - काल को भी काबू में रखने वाला यह रुद्र रूप शर्व कहलाता है।


कपाली - कपाल रखने के कारण रुद्र का यह रूप कपाली कहलाता है। इस रुप में ही दक्ष का दंभ नष्ट किया। किंतु प्राणीमात्र के लिए रुद्र का यही रूप समस्त सुख देने वाला माना जाता है।


शिव के अवतार


अर्द्धनारीश्वर
वेदों में शिव का नाम ‘रुद्र’ रूप में आया है। रुद्र संहार के देवता और कल्याणकारी हैं।
विष्णु की भांति शिव के भी अनेक अवतारों का वर्णन पुराणों में प्राप्त होता है।
शिव की महत्ता पुराणों के अन्य सभी देवताओं में सर्वाधिक है। जटाजूटधारी, भस्म भभूत शरीर पर लगाए, गले में नाग, रुद्राक्ष की मालाएं, जटाओं में चंद्र और गंगा की धारा, हाथ में त्रिशूल एवं डमरू, कटि में बाघम्बर और नंगे पांव रहने वाले शिव कैलास धाम में निवास करते हैं।
पार्वती उनकी पत्नी अथवा शक्त्ति है।
गणेश और कार्तिकेय के वे पिता हैं।
शिव भक्त्तों के उद्धार के लिए वे स्वयं दौड़े चले आते हैं। सुर-असुर और नर-नारी—वे सभी के अराध्य हैं।
शिव की पहली पत्नी सती दक्षराज की पुत्री थी, जो दक्ष-यज्ञ में आत्मदाह कर चुकी थी। उसे अपने पिता द्वारा शिव का अपमान सहन नहीं हुआ था। इसी से उसने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।
'सती' शिव की शक्त्ति थी। सती के पिता दक्षराज शिव को पसंद नहीं करते थे। उनकी वेशभूषा और उनके गण सदैव उन्हें भयभीत करते रहते थे। एक बार दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया और शिव का अपमान करने के लिये शिव को निमन्त्रण नहीं भेजा। सती बिना बुलाए पिता के यज्ञ में गई। वहां उसे अपमानित होना पड़ा और अपने जीवन का मोह छोड़ना पड़ा। उसने आत्मदाह कर लिया। जब शिव ने सती दाह का समाचार सुना तो वे शोक विह्वल होकर क्रोध में भर उठे। अपने गणों के साथ जाकर उन्होंने दक्ष-यज्ञ विध्वंस कर दिया। वे सती का शव लेकर इधर-उधर भटकने लगे। तब ब्रह्मा जी के आग्रह पर विष्णु ने सती के शव को काट-काटकर धरती पर गिराना शुरू किया। वे शव-अंग जहां-जहां गिरे, वहां तीर्थ बन गए। इस प्रकार शव-मोह से शिव मुक्त्त हुए।
बाद में तारकासुर वध के लिए शिव का विवाह हिमालय पुत्री उमा (पार्वती) से कराया गया। परन्तु शिव के मन में काम-भावना नहीं उत्पन्न हो सकी। तब 'कामदेव' को उनकी समाधि भंग करने के लिए भेजा गया। परंतु शिव ने कामदेव को ही भस्म कर दिया। बहुत बाद में देवगण शिव पुत्र—गणपति और कार्तिकेय को पाने में सफल हुए तथा तारकासुर का वध हो सका।
शिव के सर्वाधिक प्रसिद्ध अवतारों में अर्द्धनारीश्वर अवतार का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मा ने सृष्टि विकास के लिए इसी अवतार से संकेत पाकर मैथुनी-सृष्टि का शुभारम्भ कराया था।
शिव पुराण में शिव के भी दशावतारों का वर्णन मिलता है।
उनमें
महाकाल,
तारा,
भुवनेश,
षोडश,
भैरव,
छिन्नमस्तक गिरिजा,
धूम्रवान,
बगलामुखी,
मातंग और
कमल नामक अवतार हैं।
भगवान शंकर के ये दसों अवतार तन्त्र शास्त्र से सम्बन्धित हैं। ये अद्भुत शक्त्तियों को धारण करने वाले हैं।
शिव के अन्य ग्यारह अवतारों में
कपाली,
पिंगल,
भीम,
विरुपाक्ष,
विलोहित,
शास्ता,
अजपाद,
आपिर्बुध्य,
शम्भु,
चण्ड तथा
भव का उल्लेख मिलता है। ये सभी सुख देने वाले शिव रूप हैं। दैत्यों के संहारक और देवताओं के रक्षक हैं।
इन अवतारों के अतिरिक्त्त शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है।
शिव के बारह ज्योतिर्लिंग भी अवतारों की ही श्रेणी में आते हैं। ये बारह ज्योतिर्लिंग हैं-
सौराष्ट में ‘सोमनाथ’,
श्रीशैल में ‘मल्लिकार्जुन’,
उज्जयिनी में ‘महाकालेश्वर’,
ओंकार में ‘अम्लेश्वर’,
हिमालय में ‘केदारनाथ’,
डाकिनी में ‘भीमेश्वर’,
काशी में ‘विश्वनाथ’,
गोमती तट पर ‘त्र्यम्बकेश्वर’,
चिताभूमि में ‘वैद्यनाथ’,
दारुक वन में ‘नागेश्वर’,
सेतुबन्ध में ‘रामेश्वर’ और
शिवालय में ‘घुश्मेश्वर’।
अन्य देवगण—पुराणों में ब्रह्मा, वरुण, कुबेर, वायु, सूर्य, यमराज, अग्नि, मरुत, चन्द्र, नर-नारायण आदि देवताओं के अवतारों का वर्णन बहुत कम संख्या में है। उनके प्रसंग प्रायः इन्द्र के साथ ही आते हैं।


शिव चालीसा
दोहा


जय गणेश गिरिजासुवन मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम देउ अभय वरदान॥


चालीसा


जय गिरिजापति दीनदयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नाग फनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु कि हवे दुलारी। वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नंदी गणेश सोहैं तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि कौ कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहिं दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महं मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। तबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहीं पाई॥
प्रकटे उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ह दया तहं करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हां। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं त्रिपुरारी।
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सबके घट वासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावैं। भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवैं॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यह अवसर मोहि आन उबारो॥
ले त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहिं आन उबारो॥
मात पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा ही। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करों तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत हैं शम्भु सहाई॥
रनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन की इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। तन नहिं ताके रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुख हरहु हमारी॥


दोहा


नित नेम उठि प्रातः ही पाठ करो चालीस।
तुम मेरी मनकामना पूर्ण करो जगदीश॥



भगवान शिव
शिव ईश्वर का रूप हैं। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं । वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं।
शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा लिंग के रूप में की जाती है । भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है ।भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।
भगवान शिव को नमस्कार
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। भगवान शिव को सभी विध्याओ के ग्याता होने के कारण जगत गुरु भी कहा गया है। 
व्यक्तित्व
शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।
शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए। जो चतुर्दशी में पारणा करता है, वह समस्त तीर्थो के स्नान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिवरात्रि का उपवास नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं।
पूजन
शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प, प्रसाद मे भान्ग अति प्रिय हैं। एवम इनकी पूजा के लिये दूध,दही,घी,शकर,शहद इन पांच अमृत जिसे पन्चामृत कहा जाता है! पूजन में इनका उपयोग करें। एवम पन्चामृत से स्नान करायें इसके बाद इत्र चढ़ा कर जनेऊ पहनायें! अन्त मे भांग का प्रसाद चढाए ! जो इस व्रत को हमेशा करने में असमर्थ है, उन्हें इसे बारह या चौबीस वर्ष करना चाहिए। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग
 सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में
 श्रीसोमनाथ,
 श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुनश्री शैलम देवस्थानम
 उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल
 ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर
 परली में वैद्यनाथ मन्दिर, देवघर
 डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमाशंकर 
 सेतुबंध पर श्री रामेश्वर
 दारुकावन में श्रीनागेश्वर मंदिर, द्वारका
 वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ
 गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर
 हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ
 और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। 
 हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, 
 उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है। 


अनेक नाम


हिन्दू धर्म में भगवान शिव को अनेक नामों से पुकारा जाता है
रूद्र - रूद्र से अभिप्राय जो दुखों का निर्माण व नाश करता है।
पशुपतिनाथ - भगवान शिव को पशुपति इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह पशु पक्षियों व जीवआत्माओं के स्वामी हैं
अर्धनारीश्वर - शिव और शक्ति के मिलन से अर्धनारीश्वर नाम प्रचलित हुआ।
महादेव - महादेव का अर्थ है महान ईश्वरीय शक्ति।
भोला - भोले का अर्थ है कोमल हृदय, दयालु व आसानी से माफ करने वाला। यह विश्वास किया जाता है कि भगवान शंकर आसानी से किसी पर भी प्रसन्न हो जाते हैं।
लिंगम - यह रोशनी की लौ व पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है।
नटराज - नटराज को नृत्य का देवता मानते है क्योंकि भगवान शिव तांडव नृत्य के प्रेमी हैं।शान्ति नगर स्थित शिवशक्ति दुर्गा मंदिर के पं. सोहनानंद जी महाराज ने बताया कि शिवरात्रि को रात्रि में चार बार हर तीन घंटे बाद रुद्राभिषेक किया जाता है। इससे जातक का कालसर्प दोष व सभी गृहदोष दूर हो जाते हैं।


शिवरात्रि


प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।
माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। ॥ शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥


भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।
ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगों की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।
यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।


महाशिवरात्रि


महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। भगवान शिव का यह प्रमुख पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीव है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं। शिव ईश्वर का रूप हैं। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं । वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं।
इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा लिंग के रूप में की जाती है। भगवान शिव को सन्हार का देवता कहा जाता है ।
महाशिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। इसमे आत्मा और परमात्मा का मिलन, अथवा शिव और पार्वती का विवाह, मनाया जाता है। महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-
ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। सः जूं ह्रौं ॐ ॥


शिव पुराण मे शिव जी के बारे मे विस्तार से लिखा है। इसमे शिव जी के अवतार आदि विस्तार से लिखित है।


शिव तांडव स्तोत्र


जटाटवीग गलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी । विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
धरा-धरेन्द्र-नंदिनी विलास-बन्धु-बन्धुर स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे . ।
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा- कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधुर स्फुरत्वगुत्तरी यमे दुरे मनो विनोदमद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर- प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा- निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं महा कपालि संपदे शिरोजटालमस्तूनः ॥6॥
कराल भाल पट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धस्फुरत् कुहु निशी थिनी तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा- वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी- रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंग मश्वस- द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. ॥12॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌ विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .।
विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥
इइदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् .
हरे गुरौ सुभक्तिमा शुयातिना न्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥16॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥



शिव पुराण


'शिव पुराण' का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु 'शिव पुराण' में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।


भगवान शिव सदैव लोकोपकारी और हितकारी हैं। त्रिदेवों में इन्हें संहार का देवता भी माना गया है। अन्य देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में शिवोपासना को अत्यन्त सरल माना गया है। अन्य देवताओं की भांति को सुगंधित पुष्पमालाओं और मीठे पकवानों की आवश्यकता नहीं पड़ती । शिव तो स्वच्छ जल, बिल्व पत्र, कंटीले और न खाए जाने वाले पौधों के फल यथा-धूतरा आदि से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को मनोरम वेशभूषा और अलंकारों की आवश्यकता भी नहीं है। वे तो औघड़ बाबा हैं। जटाजूट धारी, गले में लिपटे नाग और रुद्राक्ष की मालाएं, शरीर पर बाघम्बर, चिता की भस्म लगाए एवं हाथ में त्रिशूल पकड़े हुए वे सारे विश्व को अपनी पद्चाप तथा डमरू की कर्णभेदी ध्वनि से नचाते रहते हैं। इसीलिए उन्हें नटराज की संज्ञा भी दी गई है। उनकी वेशभूषा से 'जीवन' और 'मृत्यु' का बोध होता है। शीश पर गंगा और चन्द्र –जीवन एवं कला के द्योतम हैं। शरीर पर चिता की भस्म मृत्यु की प्रतीक है। यह जीवन गंगा की धारा की भांति चलते हुए अन्त में मृत्यु सागर में लीन हो जाता है।


'रामचरितमानस' में तुलसीदास ने जिन्हें 'अशिव वेषधारी' और 'नाना वाहन नाना भेष' वाले गणों का अधिपति कहा है, वे शिव जन-सुलभ तथा आडम्बर विहीन वेष को ही धारण करने वाले हैं। वे 'नीलकंठ' कहलाते हैं। क्योंकि समुद्र मंथन के समय जब देवगण एवं असुरगण अद्भुत और बहुमूल्य रत्नों को हस्तगत करने के लिए मरे जा रहे थे, तब कालकूट विष के बाहर निकलने से सभी पीछे हट गए। उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब शिव ने ही उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। तभी से शिव नीलकंठ कहलाए। क्योंकि विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया था।


ऐसे परोपकारी और अपरिग्रही शिव का चरित्र वर्णित करने के लिए ही इस पुराण की रचना की गई है। यह पुराण पूर्णत: भक्ति ग्रन्थ है। पुराणों के मान्य पांच विषयों का 'शिव पुराण' में अभाव है। इस पुराण में कलियुग के पापकर्म से ग्रसित व्यक्ति को 'मुक्ति' के लिए शिव-भक्ति का मार्ग सुझाया गया है।


मनुष्य को निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म शिव को अर्पित कर देने चाहिए। वेदों और उपनिषदों में 'प्रणव - ॐ' के जप को मुक्ति का आधार बताया गया है। प्रणव के अतिरिक्त 'गायत्री मन्त्र' के जप को भी शान्ति और मोक्षकारक कहा गया है। परन्तु इस पुराण में आठ संहिताओं सका उल्लेख प्राप्त होता है, जो मोक्ष कारक हैं। ये संहिताएं हैं- विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता (पूर्व भाग) और वायु संहिता (उत्तर भाग)।


इस विभाजन के साथ ही सर्वप्रथम 'शिव पुराण' का माहात्म्य प्रकट किया गया है। इस प्रसंग में चंचुला नामक एक पतिता स्त्री की कथा है जो 'शिव पुराण' सुनकर स्वयं सद्गति को प्राप्त हो जाती है। यही नहीं, वह अपने कुमार्गगामी पति को भी मोक्ष दिला देती है। तदुपरान्त शिव पूजा की विधि बताई गई है। शिव कथा सुनने वालों को उपवास आदि न करने के लिए कहा गया है। क्योंकि भूखे पेट कथा में मन नहीं लगता। साथ ही गरिष्ठ भोजन, बासी भोजन, वायु विकार उत्पन्न करने वाली दालें, बैंगन, मूली, प्याज, लहसुन, गाजर तथा मांस-मदिरा का सेवन वर्जित बताया गया है।


विद्येश्वर संहिता


इस संहिता में शिवरात्रि व्रत, पंचकृत्य, ओंकार का महत्त्व, शिवलिंग की पूजा और दान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। शिव की भस्म और रुद्राक्ष का महत्त्व भी बताया गया है। रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही अधिक फलदायक होता है। खंडित रुद्राक्ष, कीड़ों द्वारा खाया हुआ रुद्राक्ष या गोलाई रहित रुद्राक्ष कभी धारण नहीं करना चाहिए। सर्वोत्तम रुद्राक्ष वह है जिसमें स्वयं ही छेद होता है। सभी वर्ण के मनुष्यों को प्रात:काल की भोर वेला में उठकर सूर्य की ओर मुख करके देवताओं अर्थात् शिव का ध्यान करना चाहिए। अर्जित धन के तीन भाग करके एक भाग धन वृद्धि में, एक भाग उपभोग में और एक भाग धर्म-कर्म में व्यय करना चाहिए। इसके अलावा क्रोध कभी नहीं करना चाहिए और न ही क्रोध उत्पन्न करने वाले वचन बोलने चाहिए।


रुद्र संहिता


रुद्र संहिता में शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है। इसमें नारद मोह की कथा, सती का दक्ष-यज्ञ में देह त्याग, पार्वती विवाह, मदन दहन, कार्तिकेय और गणेश पुत्रों का जन्म, पृथ्वी परिक्रमा की कथा, शंखचूड़ से युद्ध और उसके संहार आदि की कथा का विस्तार से उल्लेख है। शिव पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस (पंचामृत) से स्नान कराके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका तथा कमल के पुष्प चढ़ाएं। फिर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल अर्पित करें। इससे शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं।


इसी संहिता में 'सृष्टि खण्ड' के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति 'माया' का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही 'ब्रह्मा' और 'विष्णु' की उत्पत्ति बताई गई है।


शतरुद्र संहिता


इस संहिता में शिव के अन्य चरित्रों-हनुमान, श्वेत मुख और ऋषभदेव का वर्णन है। उन्हें शिव का अवतार कहा गया है। शिव की आठ मूर्तियां भी बताई गई हैं। इन आठ मूर्तियों से भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं। इस संहिता में शिव के लोकप्रसिद्ध 'अर्द्धनारीश्वर' रूप धारण करने की कथा बताई गई है। यह स्वरूप सृष्टि-विकास में 'मैथुनी क्रिया' के योगदान के लिए धरा गया था।


कोटिरुद्र संहिता


कोटिरुद्र संहिता में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। ये ज्योतिर्लिंगों क्रमश: सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओंकार में अम्लेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ, गोमती तट पर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वर, दारूक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर हैं। इसी संहिता में विष्णु द्वारा शिव के सहस्त्र नामों का वर्णन भी है। साथ ही शिवरात्रि व्रत के माहात्म्य के संदर्भ में व्याघ्र और सत्यवादी मृग परिवार की कथा भी है।


द्वादश ज्योतिर्लिंग




उमा संहिता


इस संहिता में शिव के लिए तप, दान और ज्ञान का महत्त्व समझाया गया है। यदि निष्काम कर्म से तप किया जाए तो उसकी महिमा स्वयं ही प्रकट हो जाती है। अज्ञान के नाश से ही सिद्धि प्राप्त होती है। 'शिव पुराण' का अध्ययन करने से अज्ञान नष्ट हो जाता है। इस संहिता में विभिन्न प्रकार के पापों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कौन से पाप करने से कौन-सा नरक प्राप्त होता है। पाप हो जाने पर प्रायश्चित्त के उपाय भी बताए गए हैं।


कैलास संहिता


कैलास संहिता में ओंकार के महत्त्व का वर्णन है। इसके अलावा योग का विस्तार से उल्लेख है। इसमें विधिपूर्वक शिवोपासना, नान्दी श्राद्ध और ब्रह्मयज्ञादि की विवेचना भी की गई है। गायत्री जप का महत्त्व तथा वेदों के बाईस महावाक्यों के अर्थ भी समझाए गए हैं।


वायु संहिता


इस संहिता के पूर्व और उत्तर भाग में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्त्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं। शिव के 'निर्गुण' और 'सगुण' रूप का विवेचन करते हुए कहा गया है कि शिव एक ही हैं, जो समस्त प्राणियों पर दया करते हैं। इस कार्य के लिए ही वे सगुण रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार 'अग्नि तत्त्व' और 'जल तत्त्व' को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूप में प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति के सम्मुख आते हैं शिव की महिमा का गान ही इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय है।







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Vinod Kumar Sharma